कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
व्रूय़ाद्य एवं गाण्डीवं देह्यन्यस्मै त्वमित्युत |
१०८ क
वन पर्व
अध्याय
११
व्यास उवाच
व्रूय़ाद्यदेष राजेन्द्र तत्कार्यमविशङ्कय़ा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूय़ाद्युधिष्ठिरं तत्र वचनान्मे द्विजोत्तम ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
व्रूय़ाद्वाक्यं यथा मन्दो न व्यथेत सुय़ोधनः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
व्रूय़ान्नास्तीति यः पश्चात्तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
व्रूय़ान्निःश्रेय़सं नाम कथं कुर्यात्सतां मतम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
दमय़न्त्यु उवाच
व्रूय़ाश्चैनं कथान्ते त्वं पर्णादवचनं यथा |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
व्रूय़ाश्चैनं त्वमासीनं कुरुभिः परिवारितम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
व्रूय़ाश्चैनं पुनर्भद्रे यत्ते कार्यं मनीषितम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
नारद उवाच
व्रूय़ास्त्वं नारदेनेति सन्तप्त इव शत्रुहन् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
वय़ं किरातैः सहिता गच्छामो गिरिमुत्तरम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
वय़ं क्षमय़ितारश्च किमन्यत्र शमाद्भवेत् ||
५३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
धृतराष्ट्र उवाच
वय़ं च कस्य कुर्यामो वहुत्वात्तात कर्मणः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
वय़ं च देशातिथय़ो गच्छ भद्रे नमोऽस्तु ते ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
वय़ं च भगवन्सर्वे जगच्च सचराचरम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
वय़ं च भृशमाविग्ना हैडिम्वस्य निपातनात् ||
७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं च मन्युना दग्धा वैरं प्रतिचिकीर्षवः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
वय़ं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुमः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
वय़ं चापि निरुत्साहा हते पितरि तेऽनघ ||
१२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
वय़ं चैव महाराज जरासन्धभय़ात्तदा |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं चैवं भ्रातरः सर्व एव; त्वय़ा जिताः कालमपास्य भोगान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
वय़ं जिज्ञासमानास्त्वा सम्प्राप्ता धर्मदर्शनात् ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
वय़ं जिता मताश्चैषां श्रान्ता व्याय़मनेन च ||
२५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
वय़ं तदा प्राप्तकालानि सर्वे; वृत्तान्युपैष्याम तदैव पार्थ ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
वय़ं तस्य नरेन्द्रस्य विषय़े निवसामहे |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
वय़ं तु गुरवस्तुभ्यं ततस्त्वां वारय़ामहे |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं तु तमृते वीरं वनेऽस्मिन्द्विपदां वर |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
वय़ं तु तेजसा तस्य सहसा हृतचेतसः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं तु धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण दुरात्मना |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
वय़ं तु न भय़ादस्य कौन्तेय़स्य महात्मनः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
वय़ं तु प्रवरं हत्वा तेषां तैः शरपीडिताः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं तु भृशमापन्ना रक्ताः कष्टमुखेऽसुखे |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं तु यदि दाहस्य विभ्यतः प्रद्रवेम हि |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
वय़ं तु राजन्पश्याम एकमेव तु निश्चय़ात् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं तु लोभान्मोहाच्च स्तम्भं मानं च संश्रिताः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
वय़ं तु व्राह्मणा नाम मृदुदण्डाः कृपालवः |
६० क
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं तु शस्त्राण्यादाय़ रथानास्थाय़ दंशिताः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं तु सत्पथं तेषां यातुमिच्छामहे प्रभो |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं ते किङ्कराः पार्थ वासुदेवश्च वीर्यवान् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं ते राजकलय़ो भविष्यामो विशां पते ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं त्वप्रतिमं वीर्ये सर्वे सौभद्रमात्मजम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
वय़ं त्वर्धेन सैन्येन प्रतिय़ोत्स्याम पाण्डवम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
युधिष्ठिर उवाच
वय़ं त्वानुगमिष्यामो येन त्वं तात यास्यसि ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं त्वामनुय़ास्यामः सौरभेय़ा इवर्षभम् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
वय़ं त्विह विनाभूता गुणवद्भिर्महारथैः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
वय़ं त्वेनं न पश्यामो मोहितास्तस्य माय़या ||
४२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
वय़ं त्वेनान्परित्यक्तुमसतोऽपि न शक्नुमः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं दुर्योधनं हत्वा मृधे भोक्ष्याम मेदिनीम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
वय़ं देवस्त्रिय़ोऽप्सरस इन्द्रं वरदं पुरा प्रभविष्णुं वृणीमह इति ||
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
वय़ं द्रोणं पुरस्कृत्य पृथिव्यां प्रवरं रथम् |
९८ क