भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तमासाद्य महावेगैर्भीष्मो नवभिराशुगैः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
तमासीनं ध्याय़मानं राजानममितौजसम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
तमासीनं महाकाय़ाः शङ्कुकर्णा महाजवाः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
तमासीनं महाप्राज्ञमुशना वाक्यमव्रवीत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
तमासीनमुपासीनः प्रणम्य शिरसा मुनिम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
तमासीनमुपासीनः शुश्रूषुर्निय़तेन्द्रिय़ः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
भीमसेन उवाच
तमास्थाय़ गतौ कृष्णौ न तय़ोर्विद्यते भय़म् ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
तमास्थाय़ महादेवस्त्रासय़न्दैवतान्यपि |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तमास्थाय़ रथं दिव्यं पर्जन्यसमनिस्वनम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तमास्थितः केशवसङ्गृहीतं; कपिध्वजं गाण्डिववाणहस्तः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
तमास्थितः सन्ददृशे किरीटी; स्रग्वी वराण्याभरणानि विभ्रत् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तमास्थितश्च भगवान्देवदेवः सहोमय़ा |
११० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
तमास्थितश्च भगवान्देव्या सह महाद्युतिः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तमास्थितो राजवरो वभूव; यथोदय़स्थः सविता क्षपान्ते |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तमाह कृष्णः किमिदं पुनर्भवा; न्विकोशमाकाशनिभं करोत्यसिम् |
८९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तमाह पुरुषो भूय़ः |
१०४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तमाह भगवानग्निरेवमस्त्विति पार्थिवम् ||
३१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
तमाह भगवान्कां ते ददानि गुरुदक्षिणाम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तमाह भगवान्रुद्रः साक्षात्तुष्टोऽस्मि तेऽनघ |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
नारद उवाच
तमाह विनतासूनुरारोहस्वेति वै द्विजम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
तमाह शक्रो भविताग्ने तवापि; ऐन्द्राग्नो वै भाग एको महाक्रतौ ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तमाहर महाराज विपाप्मैवं भविष्यसि ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
तमाहुः परमं शुक्रं वुद्धिरित्यव्ययं महत् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
तमाहुः पार्थिवाः सर्वे प्रतिमानमिव श्रिय़ः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
तमाहुः पुण्यकर्माणमशोच्यं मित्रवान्धवैः ||
८० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
तमाहुरार्ता ऋषय़ो महर्षिं; न ते वय़ं पुष्करं चोरय़ामः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
तमाहुर्व्यर्थनामानं स्त्रीवद्य इह जीवति ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तमाह्वय़त दुर्वुद्धिः पताम इति पक्षिणम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तं तथा दृष्ट्वा व्यात्ताननमिवान्तकम् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
तमाय़ान्तं महावाहुं जिगीषन्तं रणे परान् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तं महावाहुं प्रवपन्तं शिताञ्शरान् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तं महेष्वासं सात्यकिं युद्धदुर्मदम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तं महेष्वासं सोदर्याः पर्यवारय़न् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तं महेष्वासमप्रसह्यं दुरासदम् |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तं शरं घोरं शकुनिः शत्रुतापनः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तं समीक्ष्यैव श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
तमाय़ान्तं सहितं देवसङ्घैः; प्रत्युद्ययौ सपुरोधा मरुत्तः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमनादृत्य दृष्ट्वा ग्रस्तं घटोत्कचम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमभिक्रुद्धं द्रोणं दृष्ट्वा युधिष्ठिरः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमभिप्रेक्ष्य कलिङ्गो नवभिः शरैः |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमभिप्रेक्ष्य कुरवः पर्यवारय़न् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमभिप्रेक्ष्य केशवोऽर्जुनमव्रवीत् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमभिप्रेक्ष्य नृवीरं दृढवैरिणम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमभिप्रेक्ष्य प्रत्यगृह्णात्तवात्मजः |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
तमाय़ान्तमभिप्रेक्ष्य भ्राजमानं नरर्षभम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तमाय़ान्तमभिप्रेक्ष्य स तदालाय़ुधः प्रभो |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
तमिन्द्रः प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
तमिन्द्रवाहं समुपेत्य पार्थाः; प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
तमिन्द्रसमकर्माणं ककुदं सर्वधन्विनाम् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
तमिन्द्रहस्ताद्विस्रस्तं विसञ्ज्ञं पन्नगोत्तमम् |
५ क