शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
तस्माद्यष्टव्यमित्याहुः पुरुषेणानसूय़ता |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
तस्माद्यस्य महावाहो निगृहीतानि सर्वशः |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
तस्माद्यावद्धनुःश्रेष्ठे गाण्डीवेऽस्त्रं न युज्यते |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्यास्यामि तीर्थानि सरस्वत्या निषेवितुम् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
तस्माद्यास्यामि परलोकं चिराय़; न ह्युत्सहे द्रष्टुमीदृङ्नृलोके ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तस्माद्याहि शनैः सूत जघनं परिपालय़ ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
तस्माद्युक्तोऽप्यनध्याय़े नाधीय़ीत कदाचन ||
४० ग
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
तस्माद्युगपदस्यात्र ग्रहणं नोपपद्यते ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तस्माद्युद्धावचरिकं कर्म वा धर्मसंहितम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
तस्माद्युद्धे मतिं कृत्वा स्थिरां युध्यस्व भारत ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
तस्माद्युध्यस्व मा भैस्त्वं स्वधर्ममनुपालय़ |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
तस्माद्युवां करिष्यामि प्रीत्याहं सोमपीथिनौ |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
तस्माद्ये वै प्रय़च्छन्ति सुवर्णं धर्मदर्शिनः |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
तस्माद्यो रक्षति नृपः स धर्मेणाभिपूज्यते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
तस्माद्योगं समास्थाय़ त्यक्त्वा गृहकलेवरम् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
तस्माद्योगाय़ युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
तस्माद्योत्स्यामि सहितस्त्वय़ा राम महाहवे |
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
तस्माद्योधान्हनिष्यामि प्रय़ोगेणाय़ुतं सदा ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्योऽभिमतः कामः स ते सम्पत्स्यते शुभे |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
तस्माद्रक्षत सङ्ग्रामे द्रोणमेव महारथाः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
तस्माद्रक्षस्व मां यक्ष पितरं मातरं च मे ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्रक्ष्यं त्वय़ा कर्ण जीवितं चेत्प्रिय़ं तव ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
तस्माद्रक्ष्यं त्वय़ा पुत्र व्रह्मस्वं भरतर्षभ |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
तस्माद्रणे द्वैरथे मां प्रत्युद्यातारमच्युत |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
तस्माद्रथव्रजान्मुक्तो वनदाहादिव द्विपः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तस्माद्रथाच्च्यावय़ितुं न शेकु; र्धैर्यात्कृतात्मानमिवेन्द्रिय़ाणि ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
तस्माद्राजन्व्रवीम्येष वाक्यं ते यदि रोचते ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तस्माद्राजन्स्थिरो भूत्वा प्राप्येदं व्यसनं महत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
तस्माद्राजर्षय़ः सर्वे व्राह्मणानन्वपालय़न् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
तस्माद्राजा द्विजातीनां प्रय़तेतेह रक्षणे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्राजा धर्मशीलो महात्मा; हय़ग्रीवो मोदते स्वर्गलोके ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
तस्माद्राजा प्रगृहीतः परेषु; मूलं लक्ष्म्याः सर्वतोऽभ्याददीत |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
तस्माद्राजेन्द्र भूम्यर्थे नानृतं वक्तुमर्हसि |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
तस्माद्राजैव कर्तव्यः सततं भूतिमिच्छता |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
तस्माद्राजैव नान्योऽस्ति यो महत्फलमाप्नुय़ात् ||
३२ ग
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
तस्माद्राज्ञा प्रय़त्नेन स्वार्थश्चिन्त्यः सदैव हि ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
तस्माद्राज्ञा विशेषेण योद्धव्यं धर्ममीप्सता ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
तस्माद्राज्ञा विशेषेण वर्तितव्यं प्रजाहिते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
तस्माद्राज्ञा विशेषेण विकर्मस्था द्विजातय़ः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
तस्माद्राज्ञा सदा तेजो दुःसहं व्रह्मवादिनाम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्रूपेण तेषां वै दंष्ट्रिणामभितश्चरौ ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
तस्माद्वक्तव्यमेवेह त्वय़ा पश्याम्यशेषतः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
तस्माद्वक्त्राद्विनिष्पेतुस्तित्तिरास्तस्य पाण्डव ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
तस्माद्वक्त्रान्विनिष्पेतुः क्षिप्रं तस्य कपिञ्जलाः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
तस्माद्वक्ष्यामि ते राजन्भवमिच्छन्कुरून्प्रति |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
तस्माद्वधं स दुष्टात्मा नचिरात्समवाप्स्यति ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
तस्माद्वध्याः कपास्माकं धनिन्याहि यथागतम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
तस्माद्वध्योऽसि मे मूढ सभृत्यवलवाहनः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
तस्माद्वनं मध्यमं च लोकेषु तप उच्यते ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माद्वनाच्चैत्ररथप्रकाशा; च्छ्रिय़ा ज्वलन्तस्तपसा च युक्ताः ||
२० ख