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शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
तस्मान्न च्युतपूर्वोऽहमच्युतस्तेन कर्मणा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्न तापं दुहितुर्निमित्तं; पाञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
तस्मान्न देय़े शक्राय़ त्वय़ैते कुण्डले शुभे |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्न भवता चिन्ता कार्यैषा स्यात्कदाचन |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
तस्मान्न भीमान्नान्येभ्यो भय़ं मे विद्यते क्वचित् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
तस्मान्न वर्धय़ेदन्यं न चात्मानं विहिंसय़ेत् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
शल्मलिरु उवाच
तस्मान्न विभ्ये देवर्षे क्रुद्धादपि समीरणात् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
तस्मान्न शुध्यते भावो मम स ज्ञाय़तां सुहृत् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
तस्मान्नतीक्ष्णभूतानां यात्रा काचित्प्रसिध्यति ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्नदीगतं चापि उदपानं यशस्विनः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्नस्त्राहि सर्वा वै यथा नः सोम आविशेत् ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
तस्मान्नाख्यामि ते गुह्यं काले वेत्स्यति तद्भवान् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
तस्मान्नात्युत्सृजेत्तेजो न च नित्यं मृदुर्भवेत् ||
२२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
तस्मान्नात्रैव हेतुः स्याद्वध्यः किं वहु भाषसे ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तस्मान्नार्यो भविष्यन्ति वन्धक्यो वै कुलेषु वः |
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तस्मान्नार्हा वय़ं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सवान्धवान् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
कामन्द उवाच
तस्मान्नास्तिकता चैव दुराचारश्च जाय़ते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तस्मान्नाहं चले स्वार्थात्सुस्थितः सन्धिविग्रहे |
१५३ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
तस्मान्नाहं जातु कथञ्चनाद्य; त्यक्ष्याम्येनं स्वसुखार्थी महेन्द्र ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्नाहं निय़ोक्तव्या त्वय़ैषोऽस्तु वरो मम ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
तस्मान्नित्यं क्षमा तात पण्डितैरपवादिता ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
तस्मान्नित्यं दय़ा कार्या चातुर्वर्ण्ये विपश्चिता |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
तस्मान्नित्यं परीक्षेत पुरुषान्प्रणिधाय़ वै ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
अर्जुन उवाच
तस्मान्निमन्त्रय़े त्वाहं दुहितुः पृथिवीपते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
तस्मान्निर्वेद एवेह गन्तव्यः सुखमीप्सता |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
स्थाणुरु उवाच
तस्मान्निवर्त्यतामेतत्तेजः स्वेनैव तेजसा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
तस्मान्निवृत्तिमापन्नश्चरेत्सर्वाङ्गनिर्वृतः ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्निशम्य वाक्यं मे कुरुष्व यदनन्तरम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
तस्मान्निषादाः सम्भूताः क्रूराः शैलवनाश्रय़ाः |
१०३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मान्नूनं महावीर्याद्भार्गवाद्युद्धदुर्मदात् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
तस्मान्नॄणां कालरात्रिर्ज्या कृता धनुषोऽजरा ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
तस्मान्नैव मृदुर्नित्यं तीक्ष्णो वापि भवेन्नृपः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
तस्मान्नैवावगूर्याद्धि नैव जातु निपातय़ेत् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
तस्मान्नोपाय़साध्यांस्तानहं मन्ये कथञ्चन ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
तस्मान्न्याय़ागतैरर्थैर्धर्मं सेवेत पण्डितः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्नय़विधानज्ञं पुरुषं लोकविश्रुतम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण उवाच
तस्मान्मनः स्थावरत्वाद्विशिष्टं; तथा देवी जङ्गमत्वाद्विशिष्टा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
तस्मान्मनोवाक्षरीरैराचरेद्धैर्यमात्मनः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
तस्मान्मन्युपरीतस्त्वां शप्स्यामि मधुसूदन ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
तस्मान्मन्युर्न वः कार्यः क्रोधो दुःखकरो नृणाम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
तस्मान्मन्युर्विनाशाय़ प्रजानामभवाय़ च ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तस्मान्ममाश्वान्सङ्ग्रामे यत्तः संय़च्छ सारथे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
तस्मान्महत्समुत्पन्नं द्वितीय़ं राजसत्तम ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १६
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मान्महद्भय़ं तीव्रममित्रघ्नाद्धनञ्जय़ात् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
तस्मान्महेश्वरो देवस्तपस्ताभिः समास्थितः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ७३
देवय़ान्यु उवाच
तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७९
सात्यकिरु उवाच
तस्मान्माद्रीसुतः शूरो यदाह पुरुषर्षभः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्मानसमव्यग्रं कृत्वा त्वं कुरुनन्दन |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च धृतराष्ट्रो जनार्दन ||
७४ ख