वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
अहो वुद्धिमतां श्रेष्ठ शुभा वुद्धिरिय़ं तव |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
अहो वुद्धिसमाधानं वेदाभ्यासरते द्विजे |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
अहो व्राह्मणकर्माणि यथा मारुत तत्त्वतः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
अहो सम्यक्षुकेनोक्तं सर्वतः परिमुच्यता |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
अहो सह शरीरेण प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
अहो सिद्धार्थता तेषां येषां सन्तीह पाणय़ः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अहो सुवलवान्कालो गतिश्च परमा तथा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
अहो हि दुरनुष्ठेय़ो मोक्षधर्मः सनातनः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अहो ह्यकाले प्रस्थानं कृतवानसि पुत्रक |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अहो ह्यनित्यं मानुष्यं जलवुद्वुदचञ्चलम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
अहो ह्यनुगृहीतोऽद्य धर्म एभिः सुरैरिह |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
जनमेजय़ उवाच
अहो ह्येकान्तिनः सर्वान्प्रीणाति भगवान्हरिः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
अहोरात्रं च कालं च यथर्तु मधुसूदनः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण हि ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अहोरात्रं मय़ा दृष्टं तत्क्षय़ाय़ भविष्यति ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
अहोरात्रं विजानाति ऋतवश्चापि नित्यशः |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
अहोरात्रपरिक्षेपं शीतोष्णपरिमण्डलम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
अहोरात्रमिदं द्वन्द्वं तय़ोर्मध्ये हुताशनः |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
अहोरात्रमय़े लोके जरारूपेण सञ्चरन् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
अहोरात्रा मुहूर्तास्तु पित्तं ज्योतिश्च वारुणम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
अहोरात्रांश्च मासांश्च क्षणान्काष्ठाः कला लवान् |
९७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
अहोरात्राः पतन्त्येते ननु कस्मान्न वुध्यसे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
अहोरात्रान्कलाः काष्ठाः सृजत्येष सदा विभुः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
अहोरात्राश्च पुण्यार्थं तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
अहोरात्रे विदधत्कर्मणैव; अतन्द्रितो नित्यमुदेति सूर्यः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
अहोरात्रेण चैकेन सिद्धिं समधिगच्छति ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
अहोरात्रोपवासेन शक्रलोके महीय़ते ||
१५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
अहोलाभकरं दीनमल्पजीवनमल्पकम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
अहोवीर्यस्तथा काव्यस्ताण्ड्यो मेधातिथिर्वुधः ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
अहोऽभिहितमाख्यानं भवता तत्त्वदर्शिना |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
अहोऽस्मि वञ्चितो मूढो भवता गूढवुद्धिना |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
अहोऽस्म्यशुचितां प्राप्तः किमिदं क्रिय़ते त्वय़ा |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
अहोऽस्या हृदय़ं देव्या दृढं यन्न विदीर्यते |
५ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
अहोऽय़ं सुकुमाराङ्गो हिमवच्छिखरालय़ः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
अह्नः क्षय़े ललाटाच्च सुतो देवस्य वै तथा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
अह्नः परिक्षय़े व्रह्मंस्ततः साचिन्तय़त्तदा |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अह्नः सुतः स्मृतो ज्योतिः श्रमः शान्तस्तथा मुनिः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप मारिष ||
२८ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
अह्ना यदेनः कुरुते इन्द्रिय़ैर्मनसापि वा |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
अह्ना यदेनश्चाज्ञानात्प्रकरोति नरश्चरन् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
अह्ना ह्येकेन भीष्मोऽय़मय़ुतं हन्ति भारत |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
अह्नापीह तपो जातु व्राह्मणस्योपजाय़ते |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
अह्नाय़ तव सुश्रोणि शतं निष्कान्ददाम्यहम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
अह्नाय़ नरकं गच्छेत्स्वर्गेणास्य स संमितः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
अह्रीको वा विमूढो वा नैव स्त्री न पुनः पुमान् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
अहय़ः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभय़ावहाः ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं कथं स्विद्भवतां विमुक्त; स्तं वै प्रवध्नीत यथा न मुच्येत् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
अय़ं कर्णः कुतः कर्णस्तिष्ठ कर्ण महारणे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं कर्ता न क्रिय़ते कारणं चापि पौरुषे |
५० क