chevron_left  तस्मान्मान्यश्चarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ७२
देवय़ान्यु उवाच
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च व्राह्मणः प्रसृताग्रभुक् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
तस्मान्मानय़ितव्यास्ते गणमुख्याः प्रधानतः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
तस्मान्मामनुजानीत भद्रं वोऽस्तु नरर्षभाः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रिय़ेत; दद्यान्मित्रेभ्यः सङ्ग्रहार्थं धनानि |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
तस्मान्मिश्रेण सततं वर्तितव्यं युधिष्ठिर ||
२२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ४
विदुर उवाच
तस्मान्मुक्तः स संसारादन्यान्पश्यत्युपद्रवान् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्मुक्ता वय़ं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
व्यास उवाच
तस्मान्मृत्युभय़ात्कीट मा व्यथिष्ठाः कथञ्चन |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तस्मान्मृत्युमहं मन्ये प्राप्तकालमिवात्मनः ||
३३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
तस्मान्मृदु शनैरेनं व्रूय़ा धर्मार्थसंहितम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मान्मे कारणं सूत युक्तिं चैव विशेषतः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
तस्मान्मे निर्जितं ज्योतिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
तस्मान्मे निर्जिता भूमिर्वशे तिष्ठति नित्यदा ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
तस्मान्मे निर्जिताः शव्दा वशे तिष्ठन्ति नित्यदा ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
तस्मान्मे निर्जितो वाय़ुर्वशे तिष्ठति नित्यदा ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तस्मान्मे शृणु तत्त्वेन यथा युद्धमवर्तत ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
युधिष्ठिर उवाच
तस्मान्मे संशय़ं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मान्मे सञ्जय़ व्रूहि कर्णभीमौ यथा रणे |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
तस्मान्मे सम्प्रकाशन्ते त्रय़ो लोका युधिष्ठिर ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यद्वृत्तं तत्र सञ्जय़ ||
७२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
माद्र्यु उवाच
तस्मान्मे सुतय़ोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
तस्मान्मैत्रं समास्थाय़ शीलमापद्य भारत |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
तस्मान्मौनानि मुनय़ो दीक्षां कुर्वन्ति चादृताः |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
तस्माल्लम्वामहे गर्ते नष्टसञ्ज्ञा ह्यनाथवत् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माल्लेभे च सा पुत्रमश्मकं नाम भामिनी |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
तस्माल्लेभे परं स्थानं शैव्योऽपि पृथिवीपतिः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८३
इन्द्र उवाच
तस्माल्लोका अन्तवन्तस्तवेमे; क्षीणे पुण्ये पतितास्यद्य राजन् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्माल्लोभकृतं किञ्चित्तव तात न विद्यते ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
तस्मिँल्लोकपरित्यक्ते किं कार्यमवशिष्यते |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
तस्मिंश्च गतमात्रे वै राजा गौरमुखे तदा |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तस्मिंश्च तन्त्रे कृष्णाः सिताश्च तन्तवः |
१४८ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तस्मिंश्च तन्त्रे कृष्णाः सिताश्च तन्तवः |
१६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
तस्मिंश्च निधनं प्राप्ते सत्यवत्या मते स्थितः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंश्च निहते युद्धे कथं जीवेत मादृशः |
७९ ख
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंश्च निहते राजन्हीनदर्पो निराश्रय़ः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४
व्यास उवाच
तस्मिंश्च भक्षय़त्येव शङ्खोऽप्याश्रममागमत् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्रौ सङ्घृष्यन्तः परस्परम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंश्च यजमाने वै धर्मात्मनि महात्मनि |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंश्च यदुशार्दूलो दत्त्वा तीर्थे यशस्विनाम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंश्च शैलप्रवरे सुरम्ये; धनेश्वराक्रीडगता विजह्रुः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
तस्मिंश्च सुप्ते विप्रेन्द्रे सवितास्तमिय़ाद्गिरिम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
तस्मिंश्चाक्रिय़माणेऽसौ लोकवध्यो भविष्यति ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
तस्मिंश्चाधिगमिष्यन्ति यथा लोभादवर्तत ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तत्कलुषं सर्वं समाप्तमिति शव्दितम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा घोरतमे प्रवृत्ते; शङ्खस्वना दुन्दुभिनिस्वनाश्च |
११४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा मय़ा शस्ते यदि द्रौणाय़नी रुषा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने कर्णराक्षसय़ोर्मृधे |
१ क