chevron_left  तस्मिंस्तथाarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने कुरुदाशार्हनन्दनौ |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले सङ्कुले भृशम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे नादसङ्कुले |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने नराश्वगजसङ्क्षय़े |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने युद्धे भीरुभय़ावहे |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने रक्षांसि पुरुषर्षभ |
८७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने रणे भीष्मं महारथम् |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने राजन्सोमकपाण्डवाः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने सङ्कुले तुमुले भृशम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने सङ्ग्रामे लोमहर्षणे |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने सङ्ग्रामे लोमहर्षणे |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
काल उवाच
तस्मिंस्तथा व्रुवाणे तु व्राह्मणी गौतमी नृप |
७० क
वन पर्व
अध्याय १३४
लोमश उवाच
तस्मिंस्तथा सङ्कुले वर्तमाने; स्फीते यज्ञे जनकस्याथ राज्ञः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
तस्मिंस्तथार्धदिवसे कर्म कृत्वा सुदुष्करम् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तदा वर्तमाने विद्रवे भृशदारुणे |
७५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
तस्मिंस्तदा सम्प्रहारे दारुणे सङ्कुले भृशम् |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तमसि सञ्जाते प्रमूढाः सर्वतो जनाः |
९१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
तस्मिंस्तस्मिन्निमित्ते हि मतं भवति केशव |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तस्य हि सत्याशा वाल्यात्प्रभृति पाण्डवे ||
९६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
व्राह्मण उवाच
तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि शक्यः कथं चि; त्कामक्रोधाभ्यां जरय़ा मृत्युना च ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तीर्थवरे रामः प्रदाय़ विविधं वसु |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तीर्थवरे शुभ्रे शोणितं समुपावहत् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा विमुक्तः पाप्मना किल ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा शुचिः प्रय़तमानसः |
७८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा स्कन्दं चाभ्यर्च्य लाङ्गली |
९३ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गोप्रतारे नराधिप |
६५ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजय़ित्वा विभावसुम् |
१६१ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजपेय़फलं लभेत् |
१६४ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
५४ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थे महाभाग नित्यमेव पितामहः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
तस्मिंस्तीर्थे महाभाग पद्मलक्षणलक्षिताः |
८३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये परन्तप ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेचरः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
तस्मिंस्तु कथय़त्येव राजा राजीवलोचनः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तु कौरवेन्द्रे तं तथा व्रुवति पाण्डवम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु घोरे सङ्ग्रामे वर्तमाने भय़ङ्करे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले काले नारदः सुरचोदितः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे भीरूणां भय़वर्धने |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे वर्तमाने भय़ानके |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे वर्तमाने महाभय़े |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे वर्तमाने महाभय़े |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे वर्तमाने सुदारुणे |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले राजन्भीमकर्णसमागमे ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु तुमुले शव्दे प्रवृत्ते लोमहर्षणे |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु दिवसे प्राप्ते दशमे भरतर्षभ |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु निर्जिते राजन्राक्षसेन्द्रे महात्मना |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय १९३
दुर्योधन उवाच
तस्मिंस्तु निहते राजन्हतोत्साहा हतौजसः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु निहते वीरे ततस्तस्य पदानुगाः |
४९ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु निहते वीरे द्रोणपुत्रः प्रतापवान् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तु निहते वीरे राक्षसेनार्जुनात्मजे |
७१ क