chevron_left  तस्मिन्निपतितेarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्निपतिते भूमौ गतसत्त्वेऽथ सारथौ |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्निपतिते भूमौ भीमः क्रुद्धो विशां पते |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निपतिते भूमौ विदुरोऽपि महाय़शाः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निपतिते भूमौ विह्वले राजसत्तमे |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
तस्मिन्निपतिते वाणे भूमौ प्रज्वलिते ततः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे कौरवाणां धुरन्धरे |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे गदानुन्ने महासुरे |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे तावका भय़मोहिताः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे दानवास्त्रस्तचेतसः |
३७ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे नकुले चारुदर्शने |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे पत्यौ सर्वमहीक्षिताम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे शाल्वराजे विचेतसि |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे सम्प्राद्रवत सा चमूः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्निपतिते वीरे सौभद्रो द्रौपदीसुताः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
तस्मिन्निपतिते सौभे चक्रमागात्करं मम |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निरर्थकं वाक्यमुक्तं सम्पत्स्यते तव ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्निय़ुक्ते विभुना योगक्षेमाय़ भार्गवे |
४३ क
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
तस्मिन्नुच्चार्यमाणे तु गन्धर्वेण वचस्यथ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुत्पतमाने च प्रचचाल वसुन्धरा |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
तस्मिन्नुत्पथमापन्ने कुरुवृद्धः पितामहः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
तस्मिन्नुपरते चास्य पीतवस्त्रवदिष्यते |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुपरते वर्षे वाते च समतां गते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुपरते शव्दे ततस्ते व्रह्मवादिनः |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तस्मिन्नुपरते शव्दे दिशः सर्वा विनादय़न् |
७६ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
तस्मिन्नुपरते शव्दे पुनरेवान्यतोऽभवत् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुपरते शव्दे भीमसेनोऽव्रवीदिदम् |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुपरते शव्दे मुहूर्तादिव भारत |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुपरते शव्दे राधेय़ः क्रोधमूर्छितः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुपस्थिते काले तरतं प्लववन्मय़ा ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
तस्मिन्नुभय़तो दोषे कुर्वञ्छ्रेय़ः समाचरेत् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नृपतिशार्दूले निहते भूरिवर्चसि |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
तस्मिन्नृपतिशार्दूले प्रविष्टे नगरं पुनः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६९
वसिष्ठ उवाच
तस्मिन्नृपतिशार्दूले स्वर्यातेऽथ कदाचन |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्रह्मो उवाच
तस्मिन्नेकाग्रे कृतसर्वकार्ये; तत एषां भवितैवान्तकालः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे |
७७ क
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय़ प्रतस्थिरे |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेव तदा तीर्थे सिन्धुद्वीपः प्रतापवान् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेव तु धर्मात्मा वसति स्म तपोधनः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय २३
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नेव तु सर्वार्था दृश्यन्ते वै पृथग्विधाः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्नेव पदे यत्ता निगृह्णन्ति स्म भारत ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेव वने हृष्टास्त ऊषुः सह कृष्णय़ा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
तस्मिन्नेवं समुत्पन्ने निमित्ते पाण्डुनन्दन |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेवंविधे राजन्कुले महति तिष्ठति |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
तस्मिन्नेवाथ काले तु तीर्थय़ात्रामुपागतः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेवान्तरे धीमान्प्रजहाराथ राक्षसः ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नेवाश्रमे रम्ये तेपतुस्तप उत्तमम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
तस्मिन्नेवासृक्सङ्क्लिन्ने तदद्भुतमिवाभवत् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
तस्मिन्नेवोदरे गर्भः किं नान्नमिव जीर्यते ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्न्यस्ते मणौ वीर जिष्णुरुज्जीवितः प्रभुः |
१२ क