शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितो यज्ञेषु कुशलस्त्रितो वेदेषु निष्ठितः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
त्रितोपघाताद्वैरूप्यमेकतोऽथ द्वितस्तथा |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रितोऽपि गच्छतां काममावाभ्यां वै विनाकृतः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रित्वं व्रजतु ते राजन्व्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
त्रितय़ं सर्वथाप्येवं विनशिष्यत्यसंशय़म् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
त्रितय़ं सेवितं सर्वं को नु स्वन्ततरो मय़ा ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
त्रिदंष्ट्रं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
त्रिदण्डतूणसम्वाधमनेकध्वजसङ्कुलम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
त्रिदण्डादिषु यद्यस्ति मोक्षो ज्ञानेन केनचित् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
त्रिदशस्त्रिकालधृक्कर्मसर्ववन्धविमोचनः |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
मातो उवाच
त्रिदशा इव शक्रस्य साधु तस्येह जीवितम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
त्रिदशा विष्णुना सार्धमुपजग्मुः पितामहम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
त्रिदशांश्चाप्यवाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
त्रिदशानपि चोद्युक्तान्सर्वशस्त्रधरान्युधि |
२ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
त्रिदशानभ्यवर्तन्त दावदग्धा इवाद्रय़ः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
त्रिदशानां पितृणां च मुखमेवमहं स्मृतः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
त्रिदशानां यथा शक्रो वसूनामिव हव्यवाट् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरव्रवीत् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
त्रिदशानां वचः श्रुत्वा मैत्रावरुणिरव्रवीत् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
त्रिदशानां विनाशाय़ लोकानां चापि पार्थिव ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिदशानामिदं द्विष्टं भीमसेन त्वय़ा कृतम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
त्रिदशानिव गोविन्दः सततं सुमहाभय़ात् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
त्रिदशान्वा समुद्युक्तान्सहितान्दैत्यदानवैः |
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
त्रिदशापि समुद्युक्ता नालं भीष्मं समासितुम् |
१०५ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
त्रिदशेशद्विषो यावत्क्षय़मस्त्रैर्नय़ाम्यहम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिदशेशसमो वीरः खाण्डवेऽग्निमतर्पय़त् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिदशेशालय़ं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
त्रिदशेश्वरनाथस्त्वं येषां तुष्टोऽसि माधव ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
त्रिदशेषु निवत्स्यामो धर्मनिष्ठान्तरात्मसु ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिदशेष्वपि विख्यातः स्वशक्त्या सुमहावलः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
त्रिदिवं प्राप्य शक्रस्य स्वर्गलोके विमत्सराः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
त्रिद्वारामर्थसिद्धिं तु नानुपश्यन्ति ये नराः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
त्रिधा चिक्षेप समरे भारद्वाजो हसन्निव ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
त्रिधा चिच्छेद नृपतिः सा व्यकीर्यत मेदिनीम् ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
त्रिधा चिच्छेद समरे यतमानस्य कार्मुकम् ||
२९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
त्रिधा चिच्छेद समरे सहदेवो हसन्निव ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
त्रिधा चिच्छेद समरे सा पृथिव्यामशीर्यत ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
त्रिधा त्वाक्रन्द्य मित्राणि विधानमुपकल्पय़ेत् ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
त्रिधा दानानि दीय़न्ते त्रिधा यज्ञः प्रवर्तते |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
त्रिधा भिन्नेन नागेन मदान्धेन महावलः ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
त्रिधा भूत्वा महाराज तव सैन्यमुपाद्रवन् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
त्रिधा लोकास्त्रिधा वेदास्त्रिधा विद्यास्त्रिधा गतिः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
त्रिधाभूतेषु सैन्येषु वध्यमानेषु पाण्डवैः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
त्रिधाभूतैरवध्यन्त पाण्डवैः कौरवा युधि |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ||
७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
त्रिपदाः शिखिनस्तार्क्ष्याश्चतुर्दंष्ट्रा विषाणिनः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि विभेद सः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि विभेद सः ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिपादं चाय़ुतशतैर्जघान दशभिर्वृतम् ||
६५ ख