शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
नावृत्तिभय़मस्तीह परलोके भय़ं कुतः ||
३३ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
नावृत्तिर्गच्छतामस्ति सर्पाणामिव सर्पताम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
नावेक्षे हवींषि नावलिह इति ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
नावेदविदुषे वाच्यं तथा नानुगताय़ च ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
नावैद्यो नानृजुः पार्श्वे नाविद्यो नामहाधनः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
नावैषि विषय़ं येन सर्वो वा विषय़स्तव ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
नावो न सन्ति सेनाय़ा वह्व्यस्तारय़ितुं तथा |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
नाव्यवर्तन्त राजानः सहिता वानरध्वजम् ||
११४ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
नाव्रतो नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः |
९२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
नाव्रतो नानुपाध्याय़ो न च वादाक्षमो द्विजः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
नाव्रह्मचारी भिक्षावान्भिक्षुर्वाव्रह्मचारिकः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
नाव्राह्मणं भूमिरिय़ं सभूति; र्वर्णं द्वितीय़ं भजते चिराय़ |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
नाव्राह्मणः कृपणो जातु जीवे; द्या चापि स्याद्व्राह्मणी वीरपत्नी |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
नाव्राह्मणस्तात चिरं वुभूषे; दिच्छन्निमं लोकममुं च जेतुम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
नावय़ोरन्तरं किञ्चिन्मा ते भूद्वुद्धिरन्यथा ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
नावय़ोरन्तरं शक्यं वेदितुं भरतर्षभ ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
नावय़ोरेकय़ोगोऽस्ति मा कृथा वर्णसङ्करम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
नावय़ोर्विद्यते सन्धिर्निय़ुक्ते विषमे वले ||
१६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
नाश एव तु मे नूनं मन्दभाग्यस्य संय़ुगे |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
नाशं जगाम तां विप्रो व्यष्टम्भय़त कश्यपः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
नाशं विनाशमैश्वर्यं सुखदुःखे भवाभवौ |
७३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
नाशं वृष्णिकलत्राणां प्रभावानामनित्यताम् ||
२२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
नाशंसत वधं वीरः पुत्राणां तव पार्षतः ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
नाशंसन्त जय़ं युद्धे दीनात्मानो धनञ्जय़ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
नाशंससि क्रिय़ामेतां मत्तो दुर्योधन ध्रुवम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
नाशंसे भारतीं सेनां प्रवेष्टुं भीमकार्मुकाम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
नाशकंस्तत्र भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
नाशकत्तं तदा गर्भं सन्धारय़ितुमोजसा ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
नाशकत्तानतिक्रान्तुं मृत्युर्व्रह्मविदो यथा ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
नाशकत्तानि मघवा भेत्तुं सर्वाय़ुधैरपि |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
नाशकत्प्रमुखे स्थातुं शरजालप्रपीडितः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुतां तदान्योन्यमभिसन्धातुमाहवे ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुतां वारय़ितुं भीष्मद्रोणौ महारथौ ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
नाशक्नुवं पीडय़ितुं ते तु मां पर्यपीडय़न् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
नाशक्नुवं स्थापय़ितुं दीर्यमाणां स्ववाहिनीम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
नाशक्नुवंश्च किञ्चित्ते तस्य कर्तुं तदा विभो ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवंश्च तं हन्तुं सात्यकिं प्रवरा रथाः ||
७१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
नाशक्नुवंस्तदा गन्तुं निद्रय़ा च प्रवृद्धय़ा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
नाशक्नुवंस्तमारोढुं विषण्णमनसो जनाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवंस्ते संसोढुं स्पर्शमग्नेरिव प्रजाः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
नाशक्नुवञ्शमय़ितुं तदाभूवन्पराङ्मुखाः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
नाशक्नुवद्धारय़ितुं मनोऽथास्यावसीदति ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
नाशक्नुवनभिद्रष्टुं कुत एवाधिरोहितुम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवन्नवस्थातुं काल्यमाना महात्मना ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवन्नवस्थातुं भ्रमरैरिव दंशिताः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
नाशक्नुवन्प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य सर्वतः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवन्वारय़ितुं तदद्भुतमिवाभवत् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवन्वारय़ितुं तदानीं; सर्वे गणा भारत ये त्वदीय़ाः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवन्वारय़ितुं त्वदीय़ाः; सर्वे रथा भारत माधवाग्र्यम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
नाशक्नुवन्वारय़ितुं पाण्डवानां महद्वलम् ||
२१ ख