शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वसन्तं यथा नागं पर्यश्रुनय़नं तथा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
भीष्म उवाच
निःश्वसन्तं यथा नागं प्रव्याहाराय़ भारत ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
निःश्वसन्तं यथा नागमद्य पश्यन्तु कौरवाः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
निःश्वसन्तं यथा नागमर्जुनः परवीरहा ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
निःश्वसन्तः समुत्पेतुस्तेजो घोरं मुमुक्षवः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वसन्तमनेकाग्रमिति होवाच सञ्जय़ः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
निःश्वसन्तीं सतीं वालां दुःखशोकपराय़णाम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
निःश्वसन्तो महानागैरर्दिताः सुषुपुर्द्विज ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
निःश्वसन्दीर्घमुष्णं च पुनः पाण्डवमभ्ययात् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
निःश्वसन्दीर्घमुष्णं च विमनाश्चाभवत्तदा ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
निःश्वसन्दुःखसन्तप्तः कुम्भे क्षिप्त इवोरगः ||
९७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वसन्नग्निवर्णेन सन्तप्तः स्वेन मन्युना |
६ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वसन्नुपसङ्गम्य क्रुद्धो राजानमव्रवीत् ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च ततश्चिन्तापरोऽभवत् ||
५९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च तूष्णीमासीद्विशां पते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वस्य पुरुषव्याघ्रः सम्प्रदध्यौ परन्तपः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वस्य सुभृशं दीर्घं मुहुः सञ्चिन्तय़न्निव |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
निःश्वासः पवनश्चापि तेजोऽग्निश्च तवाच्युत |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वासक्ष्वेडनादेन भर्त्सय़न्तमिव स्थितम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
निःश्वासपरमश्चासीद्द्रोणं प्रतिचिकीर्षय़ा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वासपरमो दीनो विभ्रत्कोपविषं महत् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
सूत उवाच
निःश्वासमुष्णमसकृद्दीर्घं राजीवलोचनः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वासोच्छ्वासतुल्यश्च तुल्यप्राणशरीरवान् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
निःसंशय़ं क्षत्रिय़पुङ्गवास्ते; यथा हि युद्धं कथय़न्ति राजन् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
निःसंशय़ं निश्चितधर्मशास्त्राः; सर्वे भवन्तो विदितप्रमाणाः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
निःसंशय़ं फलं लव्ध्वा दक्षो भूतिमुपाश्नुते ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
शार्ङ्गका ऊचुः
निःसंशय़ात्संशय़ितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
निःसंशय़ेषु सर्वेषु नित्यं वसति वै हरिः |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
निःसंशय़ो वधः पुंसां स्त्रीणां संशय़ितो वधः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
निःसङ्गात्मानमासाद्य षड्विंशकमजं विदुः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निःसञ्ज्ञं पतितं भूमौ तदासीद्राजमण्डलम् |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
निःसञ्ज्ञः पतितो भूमौ किल्विषं प्रतिपद्यताम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
निःसञ्ज्ञा पतिता भूमौ सर्वाण्यन्तःपुराणि च ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
निःसत्त्वाश्च ससत्त्वाश्च क्षितौ पेतुस्तदा जनाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
निःसन्दिग्धं च सूक्ष्मं च विवुद्धं विमलं तथा |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
निःसन्दिग्धं प्रवुद्धस्त्वं वुध्यमानश्चराचरम् |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
निःसन्दिग्धं मय़ा वाक्यमेतत्ते समुदाहृतम् |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
निःसन्दिग्धमनीहो वै मुक्तः सर्वपरिग्रहैः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
निःसन्देहमिदं सर्वं पितामह यथा श्रुतिः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
निःसपत्नः सुखी राजा विजहार युधिष्ठिरः ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
निःसपत्ना मही यस्य त्रय़ोदश समाः स्थिता |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
निःसपत्नौ कुरुक्षेत्रे निवेशमभिचक्रतुः ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
निःसरन्ति च कोशेभ्यः शस्त्राणि विविधानि च ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
निःसारं काङ्क्षमाणस्तु तेजसा प्रत्यहन्यत ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
निःसुखा निर्धना ये च तान्नमस्यामि यादव ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
निःसृतानां जतुगृहाद्धिडिम्वात्पुरुषादकात् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
निःसृतो भगवान्धर्मः सर्वलोकसुखावहः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
निःसृत्याकाशमाविश्य क्षणेनान्तरधीय़त ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
व्यास उवाच
निःस्तुतिर्निर्नमस्कारः परित्यज्य शुभाशुभे |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
निःस्नेहा दानवाविष्टाः समाक्रान्तेऽन्तरात्मनि ||
१३ ख