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आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तस्मै प्रतिकुरुष्व त्वं पन्नगाय़ दुरात्मने ||
१८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तस्मै प्रतिवचः सा तु भर्त्रे न प्रददौ तदा |
५९ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै प्रदेय़ं प्राय़च्छत्प्रीतो राजा धनं वहु |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
तस्मै प्रसन्नो दमनः सभार्याय़ वरं ददौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
तस्मै प्रादात्सद्य एव श्रुतं च; भार्यां च वै दुहितरं स्वां सुजाताम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
तस्मै प्रादात्सहस्रं वै वाजिनां वरुणस्तदा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
तस्मै प्रादाद्वरानिन्द्र उक्तवान्यान्महातपाः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
तस्मै प्रादाद्व्राह्मणाय़ क्षुधिताय़ तपस्विने ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तस्मै प्रासृजदुग्राणि विविधानि परन्तपः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
तस्मै प्रोवाच तत्सर्वं पिता पुत्राय़ पृच्छते |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
तस्मै प्रोवाच तत्सर्वमेवं पृष्टः पितामहः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
शकुन्तलो उवाच
तस्मै प्रोवाच भगवान्यथा तच्छृणु पार्थिव ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
तस्मै प्रोवाच वचनं प्रणताय़ हितं तदा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
तस्मै प्रय़च्छतो रूपं प्रीतौ देवाविहाश्विनौ ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै प्रय़तमानाय़ सारथ्यर्थं वृहन्नडे |
५ क
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै प्रय़ाचमानाय़ न देय़े कुण्डले त्वय़ा |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
तस्मै भगवते कृत्वा नमः शर्वाय़ वेधसे |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै भीष्माभ्यनुज्ञातः सहदेवः प्रतापवान् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
तस्मै मन्त्रः प्रय़ोक्तव्यो दण्डमाधित्सता नृप ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
तस्मै यक्षप्रधानाय़ स्थूणाकर्णाय़ भारत ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै यथावत्सत्कारं कृत्वा तेन च सान्त्विताः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
तस्मै यमः समुत्थाय़ पूजां कृत्वा च वीर्यवान् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै युधिष्ठिरः पूजां यथार्हमकरोत्तदा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
तस्मै राजन्सुरेन्द्राय़ नारदो वदतां वरः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
तस्मै राज्ञे सदस्येभ्यः क्षत्रिय़ेभ्यश्च सर्वशः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
तस्मै राज्ञे स्थविराय़ाभिवाद्य; आचक्षीथाः सञ्जय़ मामरोगम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
तस्मै राज्यं समाधाय़ अंशुमानपि संस्थितः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
तस्मै वरानचिन्त्यात्मा नीलकण्ठः पिनाकधृक् |
७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
तस्मै वरानददंस्तत्र देवा; दृष्ट्वा भीमं कर्म रणे कृतं तत् |
८० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै वाणांस्ततो जिष्णुर्निर्मुक्ताशीविषोपमान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
तस्मै वाणाञ्शिलाधौतान्प्रसन्नाग्रानजिह्मगान् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
तस्मै विनिश्चय़ार्थं स परिपृष्टार्थनिश्चय़ः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मै व्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभो ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै व्रह्मा ददौ प्रीतो वलिनो वातरंहसः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
तस्मै शुश्रूषमाणाय़ भार्गवोऽकथय़त्कथाम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
तस्मै श्राद्धं न दातव्यं न हि भस्मनि हूय़ते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
तस्मै शय़्यासनं दिव्यं वरार्हं रत्नभूषितम् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै स कुरुमुख्याय़ यथावत्परिपृच्छते |
६६ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मै स भगवांस्तुष्टो भ्राता भ्रात्रे धनेश्वरः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
तस्मै स राजा स्वां भार्यां सुदेष्णां प्राहिणोत्तदा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
तस्मै स विधिवत्कृत्स्नं व्रह्मास्त्रं सनिवर्तनम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
तस्मै स व्राह्मणो नादात्पुत्रं वासवसंमितम् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तस्मै सदा प्रय़च्छन्ति वैश्यपुत्राः कुमारकाः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै सप्त सहस्राणि हय़ानां वातरंहसाम् |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
तस्मै सम्प्रतिपन्नाय़ यथावत्परिपृच्छते |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै सर्वं विधिं राजन्राजाचख्यौ महामतिः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै ससचिवाय़ त्वं प्रसादं कर्तुमर्हसि ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
तस्मै सोऽथासनं दत्त्वा पाद्यमर्घ्यं तथैव च |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कक्ष्या व्यतिक्रम्य तिस्रो द्वाःस्थैरवारितः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
तस्य कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा |
५ क