सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
वर्ष्मवांश्चाभवद्युद्धे देवसृष्टेन तेजसा ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
वर्हिषद्भ्यश्च सङ्क्रान्तः सामवेदान्तगं द्विजम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
वर्हिष्कान्तरिते नित्यं शय़ानोऽग्निगृहे सदा ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
वर्ही च गुणसम्पन्नः प्राचीं दिशमुपाश्रिताः ||
३१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
वरय़स्व वरं देवि दातास्मीति पुरन्दर ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
वरय़ां चक्रतुः कन्यां दशार्णाधिपतेः सुताम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
वरय़ामास चैवैनं पतित्वे वरवर्णिनी ||
२६ ग
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
वरय़ामास तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
वरय़ामास देवेशमास्थितस्तप उत्तमम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
वरय़ामास पुत्रत्वे नीललोहितसञ्ज्ञितम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
वरय़ाम्यात्मनोऽर्थाय़ दुर्योधनसुतामिति ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
वरय़ार्थं त्वमन्यं वै तं ते दास्यामि सुव्रत ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
वरय़ित्वा द्विजं सिद्धं हुत्वा पुंसवनेऽनलम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
वरय़ित्वा यथान्याय़ं मन्त्रवत्परिणीय़ च ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
वरय़िष्याव तं गत्वा यत्नमास्थाय़ मातले ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
वरय़िष्ये नरव्याघ्र नैवं दोषो भविष्यति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
वरय़े त्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रय़च्छ मे ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
वलं कस्माद्वर्धय़ित्वा परस्य; निजान्कस्मात्कर्शय़ित्वा सहाय़ान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
वलं कालो ग्रसति तु तं विद्वान्कुरुते वशे ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
वलं कुरूणां सङ्ग्रामे तदा स्मर्तासि मे वचः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
वलं कुरूणामुद्विग्नं सर्वमासीत्पराङ्मुखम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
वलं कोशममात्यांश्च कस्यैतानि न वा नृप ||
१५३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
वलं च ते यशश्चैव धर्मः कीर्तिश्च वर्धताम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
वलं च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं सम्प्रय़च्छ मे ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
वलं च शक्तिं चास्थाय़ न वै त्वय़्यनृतं वदे ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
वलं चातिवलं चैव महावक्त्रौ महावलौ |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
वलं चैव रणे नित्यं भय़ेभ्यश्चैव रक्षति ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
वलं तपश्च सत्यं च धर्मः कामात्मजः प्रभो |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
वलं तवाद्भुतं वीर त्वं देवानामरीञ्जहि |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
वलं तु नीतिमात्राय़ हठे जय़पराजय़ौ ||
४९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
वलं तु मत्स्यस्य वलेन राजा; सर्वं त्रिगर्ताधिपतिः सुशर्मा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
वलं तु मम जानीहि महच्चासह्यमेव च ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
वलं तु वाचि द्विजसत्तमानां; क्षात्रं वुधा वाहुवलं वदन्ति |
८१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
वलं तु हतभूय़िष्ठं तत्तदासीत्पराङ्मुखम् ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
वलं तेऽभज्यत विभो पाण्डवेय़ैः समन्ततः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
वलं तेऽभज्यत विभो युय़ुधानशरार्दितम् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
वलं त्रिगुणतो हीनं योध्यं प्राह वृहस्पतिः |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
वलं त्वासीद्द्वापरे पार्थ कृष्णः; कलावधर्मः क्षितिमाजगाम ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
विष्णुरु उवाच
वलं ददामि सर्वेषां कर्मैतद्ये समास्थिताः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
वलं पञ्चविधं नित्यं पुरुषाणां निवोध मे |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
वलं परेषां दुर्धर्षं त्यक्त्वा प्राणानरिन्दम ||
६१ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वलं भीम जरासन्धे दर्शय़ाशु तदद्य नः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
वलं महद्दुर्भिदमल्पधैर्यैः; समाश्रितौ योत्स्यमानौ त्वदर्थे ||
१०४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
वलं मेधाः प्रजरति प्राणाः सन्त्वरय़न्ति च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
वलं मोहोऽभिमानश्च उद्वेगश्चापि सर्वशः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
वलं वभूव राजेन्द्र प्रभूतगजवाजिमत् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
वलं वलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
वलं वलवतोऽपीह प्रणश्यत्यन्नहानितः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
वलं वलवदप्यस्य यदि वक्ष्यसि माधव |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
वलं विज्ञातुमिच्छामि यत्ते परमनुत्तमम् |
२३ क