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कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तस्य नानदतः केतुं चन्दनागुरुभूषितम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तस्य नानदतः केतुमुच्चकर्त सकार्मुकम् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तस्य नानदतः श्रुत्वा पाण्डवोऽच्युतमव्रवीत् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तस्य नानदतो द्रोणः शिरः काय़ात्सकुण्डलम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
तस्य नान्यं प्रपश्यामि संय़ुगे भेषजं महत् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य नान्यो निहन्तास्ति त्वदृते शत्रुकर्शन ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय १७
कृष्ण उवाच
तस्य नामाकरोत्तत्र प्रजापतिसमः पिता |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य नाम्ना च तत्तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम् ||
१६ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य नाम्ना च तत्तीर्थं शिवं पुण्यं सनातनम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्वूद्वीपः सनातनः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य नाम्नाभिविख्यातं पृथिव्यां कुरुजाङ्गलम् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
तस्य नाराय़णस्तुष्टस्तेनालौल्येन कर्मणा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
तस्य नाराय़णे भक्तिं वहतोऽमित्रकर्शन |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य नाशं विनाशं वा जरय़ा मरणेन वा |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
तस्य नास्ति समुद्धर्तेत्यथ कृष्णे न्यवेदय़न् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
तस्य नाहं वधं मन्ये देवैरपि सवासवैः |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
तस्य नाय़ं न च परो लोको भवति धर्मतः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूय़ते महत् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
तस्य नित्यं तथाषाढ्यां माघ्यां च वहवो द्विजाः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य निर्मुच्यमानस्य कवचात्काय़ आवभौ |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
तस्य निष्कृतिमाधत्त न ह्यसौ यज्ञसंविधिः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
तस्य निष्ठावसानान्ते रुदन्तः किं करिष्यथ ||
७८ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य निष्पिष्यमाणस्य पाण्डवस्य च गर्जतः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युय़ुत्सवः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युय़ुत्सवः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
तस्य पक्षस्य सदृशमिदं मम भवेदथ ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
तस्य पक्षाग्रविक्षेपैः क्लमं व्यपनय़त्खगः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
तस्य पञ्चशिखः शिष्यो मानुष्या पय़सा भृतः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पद्मप्रतीकाशे स्वभावाय़तविस्तृते |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
तस्य पर्येषणं गच्छेत्प्राचीनं नोत दक्षिणम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तस्य पर्वतसङ्काशा व्यरोचन्त महागजाः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तस्य पाञ्चालपुत्रस्तु प्रतीपमभिधावतः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य पाटय़तः काष्ठं स्वेदो वै समजाय़त |
२ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पादौ च पाणी च शिरो ग्रीवां च सर्वशः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पापकृतो द्रौणेर्न चेदद्य त्वय़ा मृधे |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
तस्य पापस्य करणात्फलं प्राप्नुहि दुर्मते ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
तस्य पापस्य गान्धारे पश्य व्यसनमागतम् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तस्य पापस्य तद्वाक्यं सुवर्णविकृताः शराः |
८१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
तस्य पापस्य सततं क्रिय़माणस्य कर्मणः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थः शरान्सप्त प्रेषय़ामास भारत |
६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पार्थः शरैर्दिव्यैर्ध्वजं हेमपरिष्कृतम् |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पार्थः शिरस्त्राणमर्धचन्द्रेण पत्रिणा |
११ क
सभा पर्व
अध्याय २३
अर्जुन उवाच
तस्य पार्थिवतामीप्से करस्तस्मै प्रदीय़ताम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
तस्य पार्थिवसङ्घस्य तस्य चैव महात्मनः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
तस्य पार्थिवसिंहस्य राज्यं धर्मेण शासतः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा केतुं चिच्छेद मारिष ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा तूणीरान्संनिकृत्य च |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा त्वरमाणः पराक्रमी |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा शरावापं निहत्य च |
६ क