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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
अय़त्नसाध्यं मुनय़ो वदन्ति; ये चापि मुक्तास्त उपासितव्याः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
अय़त्नात्कौरवेय़स्य वशे स्थास्यति गौतम ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
अय़त्नेनादहत्सर्वान्खलिनः स्वेन तेजसा ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
अय़त्नेनैव तं कर्णः शरैरुप समाकिरत् |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अय़त्नेनैव राधेय़ द्रष्टास्यद्य धनञ्जय़म् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
अय़थार्थो हि ते वर्णो वक्ष्यामि शृणु तन्मम ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
अय़थावत्प्रजानाति वुद्धिः सा पार्थ राजसी ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
अय़नं तस्य षण्मासा उत्तरं दक्षिणं तथा |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
अय़नं दक्षिणं हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तराय़णे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
अय़नं मम तत्पूर्वमतो नाराय़णो ह्यहम् ||
३५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अय़नेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
अय़मग्निर्दहन्कक्षमित आय़ाति भीषणः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अय़मत्यन्तशत्रुर्मे वैषम्यं परमं गतः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
अय़मत्र भवेद्वन्धुरनेन सह मोक्षणम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
अय़मम्भो गृहीत्वा तु राजराजस्य शासनात् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अय़मर्जुनोऽय़ं गोविन्द इमौ यादवपाण्डवौ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
अय़मर्थो न संवेद्यो भीमे मातः कथञ्चन |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़मश्वो महावाहो मय़ा ते परिमोक्षितः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
अय़मश्वो मय़ा व्रह्मन्नुत्सृष्टः पृथिवीमिमाम् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
अय़मश्वोऽनुसर्तव्यः स शेषे किं महीतले ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़मस्मानपाहाय़ दुःखे चाधाय़ शाश्वते |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
अय़मस्मि भो उपाध्याय़ कूपे पतित इति ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
भगवानु उवाच
अय़मस्मि महावाहो व्रूहि यत्ते विवक्षितम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
अय़मस्म्यत्र केदारखण्डे निःसरमाणमुदकमवारणीय़ं संरोद्धुं संविष्टो भगवच्छव्दं श्रुत्वैव सहसा विदार्य केदारखण्डं भवन्तमुपस्थितः |
२८ ग
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अय़मादिशरीरेण देवसृष्टेन मानवः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
अय़माश्वासय़ाम्येनां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
अय़माय़ाति ते भद्रे श्वशुरो मधुसूदनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५१
ऋत्विज ऊचुः
अय़माय़ाति वै तूर्णं तक्षकस्ते वशं नृप |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ११
व्यास उवाच
अय़माय़ाति वै राजन्मैत्रेय़ो भगवानृषिः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
मरुत्त उवाच
अय़माय़ाति वै वज्री दिशो विद्योतय़न्दश |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़मिच्छन्हि तान्सर्वान्यतमानाञ्जनार्दनः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
अय़मिन्द्रस्त्रिभुवने निय़ोगाद्व्रह्मणः कृतः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
संवर्त उवाच
अय़मिन्द्रो हरिभिराय़ाति राज; न्देवैः सर्वैः सहितः सोमपीथी |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
अय़मिष्टं च ते कामं वीर भूय़ो ददाम्यहम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
अय़मुक्तः प्रय़च्छेति जानता विभवं लघु ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५१
दुर्योधन उवाच
अय़मुत्सहते राजञ्श्रिय़माहर्तुमक्षवित् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
अय़मुत्सहते राजञ्श्रिय़माहर्तुमक्षवित् |
४० क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़मेकोऽर्जुनो योद्धा वृद्धवालं हतेश्वरम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
अय़मेव विधाता च यथैवेन्द्रः प्रजापतिः |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
शुक्र उवाच
अय़मेहीति शव्देन मृतं सञ्जीवय़ाम्यहम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
अय़शः पातय़ित्वा मे मूर्ध्नि त्वं कुलपांसने |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय १३
द्रौपद्यु उवाच
अय़शः प्राप्नुय़ाद्घोरं सुमहत्प्राप्नुय़ाद्भय़म् ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
अय़शस्यमतोऽन्यत्स्यादधर्म्यं च महाभुज ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
अय़शस्यमधर्म्यं च यन्मृषा धर्मकोपनम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़शस्यमशक्यं च कर्म कर्तुं समुद्यताः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
अय़शस्यामसंशव्द्यामलक्ष्मीं व्यपनोत्स्यथ ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
अय़सा चाप्ययश्छिन्द्यान्निर्विचेष्टमचेतनम् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
अय़सामिव सम्पातः शिलानामिव चाभवत् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
अय़स्कुशान्तान्पतितान्मुसलानि गुरूणि च ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
अय़स्मय़ं ताम्रमय़ं च भाण्डं; ददौ द्विजातिप्रवरेषु रामः ||
३१ ख