शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
वोधनार्थं हि योधानां सैन्यानां चाप्युदीर्यताम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
वोध्यं दान्तमृषिं राजा नहुषः पर्यपृच्छत |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
वोध्यं विद्यामय़ं दृष्ट्वा योगिभिः परमात्मभिः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
वोध्यमानं तु तत्सैन्यं राजंश्चन्द्रस्य रश्मिभिः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
वोधय़ंस्तापय़ंश्चैव जगदुत्तिष्ठतः पृथक् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
वोधय़न्त्यद्य तं नूनं श्वापदा विकृतैः स्वरैः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
वोधय़न्पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमव्रवीत् |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
वोधय़ामास तौ वीरौ प्रज्ञास्त्रेण प्रवोधितौ ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
व्यंसनेनाश्वसेनस्य पन्नगेन्द्रसुतस्य वै ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
व्यंसितं वीक्ष्य निस्त्रिंशं सौभद्रेण रणे तदा |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
व्यंसिता चाप्युपाय़ेन शक्रदत्ता मय़ानघ ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यंसितो व्रीडितो राजन्नाजगाम स कुण्डिनम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यंसय़ामास तं तस्य प्रहारं भीमविक्रमः ||
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
व्यंसय़ित्वा गदां तां च प्रेषय़ामास पार्षते ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
व्यकर्षच्चापि विधिवत्सशरं धनुरुत्तमम् ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
व्यकर्षत वलात्कर्ण इन्द्राय़ुधमिवोच्छ्रितम् ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
व्यकाशत महाराज श्वाविच्छललितो यथा ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
व्यक्तं किष्कुपरीणाहं द्वादशारत्नि कार्मुकम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
व्यक्तं चासां तथैवान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति ||
११३ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
व्यक्तं ते विदितो राजन्नर्थो द्रव्यपरिग्रहः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
व्यक्तं त्वमप्युपहितः पाण्डवैः पापदेशज |
९५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
व्यक्तं त्वय़ा तत्रापराद्धं येनास्यभिहत इति ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
व्यक्तं दिष्टं हि वलवत्पौरुषादिति मे मतिः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
व्यक्तं दुर्योधनो दृष्ट्वा शोचन्हास्यति जीवितम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यक्तं दूरमितो भीमः प्रविष्ट इति मे मतिः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यक्तं दूरे विराटस्य राजधानी भविष्यति |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
व्यक्तं द्रोणमय़ं लोकमद्य पश्यति दुर्मतिः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
भीम उवाच
व्यक्तं धीमान्सव्यसाची नराग्र्यः; सैन्यं ह्येतच्छादय़त्याशु वाणैः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
व्यक्तं पश्यन्ति शस्त्राणि सङ्ग्रामं समुपस्थितम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
व्यक्तं भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
व्यक्तं भीत इवाभ्येति राजासौ भीष्ममन्तिकात् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
व्यक्तं मृत्युमुखं विद्यादव्यक्तममृतं पदम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
४८
सूत उवाच
व्यक्तं मय़ापि गन्तव्यं पितृराजनिवेशनम् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
गन्धर्व उवाच
व्यक्तं वज्रं मोक्ष्यते ते महेन्द्रः; क्षेमं राजंश्चिन्त्यतामेष कालः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
वासुदेव उवाच
व्यक्तं शिवं तव भ्रातुः सामात्यस्य भविष्यति |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
व्यक्तं स नरके मज्जेदगाधे विपुलेऽप्लवे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
व्यक्तं सौक्ष्म्याच्च धर्मस्य प्राप्स्यामः स्त्रीवधं वय़म् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
व्यक्तः सत्त्वगुणस्त्वेवं पुरुषोऽव्यक्त इष्यते |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
व्यक्तमर्जुन सङ्ग्रामे ध्रुवस्ते विजय़ो महान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा वुद्धमथेतरत् |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
व्यक्तमाकुलय़ा वुद्ध्या प्रज्ञाचक्षुः पिता मम |
९१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
व्यक्तमेव च मे शंस यथा युद्धमवर्तत |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
व्यक्तश्चानुग्रहो यस्य यथार्थश्चापि निग्रहः |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
व्राह्मण उवाच
व्यक्तानव्यक्तरूपांश्च शतशोऽथ सहस्रशः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
व्यक्ताव्यक्तकराचिन्त्य क्षेमं पन्थानमास्थित |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
व्यक्ताव्यक्तामितस्थान निय़तेन्द्रिय़ सेन्द्रिय़ |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
व्यक्ताव्यक्ते च यत्तत्त्वं सम्प्राप्तं परमर्षिणा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
व्यक्तिभावगतस्यास्य एका मूर्तिरिय़ं शिवा |
५८ क