वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां देवर्षिजुष्टाय़ां नैमिषं नाम भारत |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
तस्यां देवेश्वरः पार्थ सभाय़ां परमासने |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महर्षय़ः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां नद्यां महासत्त्वः सौगन्धिकवनं महत् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां नद्यामजनय़न्मिथुनं पर्वतः स्वय़म् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
तस्यां निशाय़ां व्युष्टाय़ां गते तस्मिन्द्विजोत्तमे |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
तस्यां निशाय़ां व्युष्टाय़ां द्रोणः शस्त्रभृतां वरः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पञ्चाशतं कन्याः स एवाजनय़न्मुनिः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रं जनय़ामास यौधेय़ं नाम ||
८३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रं निरमित्रं नामाजनय़त् ||
८६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रं मतिनारं नामोत्पादय़ामास ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रं सर्वगं नामोत्पादय़ामास ||
८४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रमजनय़त्तंसुं नाम ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रमजनय़त्सुहोत्रं नाम ||
८७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रमजनय़दृक्षम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रमभिमन्युं नाम जनय़ामास ||
८५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रानजनय़च्चतुरो व्रह्मवादिनः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुत्रानुत्पादय़ामास देवापिं शन्तनुं वाह्लीकं चेति ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां पुर्यां तदा चैव माहिष्मत्यां कुरूद्वह |
२३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तस्यां प्रकुरुते भावं सा तस्योद्योगकारिका ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
तस्यां प्रतिहताय़ां तु दानवा युद्धदुर्मदाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
तस्यां प्रय़तमानाय़ां ये स्युस्तत्परिपन्थिनः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां भूमौ वलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते |
९ क
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
तस्यां मृग्यां समभवत्तस्य पुत्रो महानृषिः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
तस्यां रजन्यां घोराय़ां नदन्त्यः सर्वतः शिवाः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तस्यां रजन्यां मध्ये तु प्रतिवुद्धो जनार्दनः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां रजन्यां व्युष्टाय़ां धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां रजन्यां व्युष्टाय़ां राजानः सर्व एव ते |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
तस्यां राजर्षय़ः पुण्यास्तथा व्रह्मर्षय़ोऽमलाः |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीताय़ां धृष्टद्युम्नस्य सारथिः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीताय़ां प्रातरुत्थाय़ कीचकः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीताय़ामुदिते सूर्यमण्डले |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
तस्यां विदीर्यमाणाय़ां शिनेः पौत्रो महारथः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
युधिष्ठिर उवाच
तस्यां विहन्यमानाय़ां दुःखो मृत्युरसंशय़म् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तस्यां वीरापहारिण्यां निशाय़ां कर्णमभ्ययात् ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
तस्यां वेद्यां तदा राजंश्चित्रभानुरजाय़त |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
तस्यां वैश्रवणो राजा विचित्राभरणाम्वरः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
तस्यां वय़ममित्रघ्न निवसामोऽकुतोभय़ाः ||
५१ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
तस्यां शिंशपपालाशास्तथा काशकुशादय़ः |
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
तस्यां स भगवानास्ते विदधद्देवमाय़या |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
तस्यां संसक्तमनसः कौमारव्रह्मचारिणः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां संसदि सर्वस्यां क्षत्तारं पूजय़ाम्यहम् |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
तस्यां सञ्जनय़ामास कुरुं संवरणो नृपः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां सभाय़ां दिव्याय़ामूषतुस्तौ नरर्षभौ ||
६० ग
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां सभाय़ां नलिनीं चकाराप्रतिमां मय़ः |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां सभाय़ां रम्याय़ां रेमे शक्रो यथा दिवि ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां सभाय़ां रम्याय़ां विजहार मुदा युतः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
तस्यां सभाय़ां राजर्षे वैवस्वतमुपासते ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यां सभाय़ामासीनाः सुव्रताः सत्यसङ्गराः |
३४ क