कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तस्यातिवेगस्य रणेऽतिवेगं; नाशक्नुवन्धारय़ितुं त्वदीय़ाः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
तस्यातिय़शसः पुण्यां विशालां वदरीमनु |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
तस्यात्मजश्च प्रमतिर्वेदवेदाङ्गपारगः |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
तस्यात्मजस्तुल्यगुणः सिन्धुद्वीपो महाय़शाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
तस्यात्मना तु सदृशमात्मानं परमं ददौ |
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
तस्यात्मानं सन्त्यजतो लोका नश्यन्त्यनात्मनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
तस्यात्मानमथाविश्य योगसिद्धो महामुनिः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
तस्याथ कामधुग्धेनुर्वसिष्ठस्य महात्मनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याथ कारय़ामास वर्धमानस्य धीमतः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तस्याथ चतुरो वाहांश्चतुर्भिः साय़कोत्तमैः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
तस्याथ मध्ये वेतसः पुण्यगन्धः; सहस्रशाखो विमलो विभाति |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
तस्याथ मनुजश्रेष्ठ ते भार्ये कमलेक्षणे |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याथ मिथुनं जज्ञे गौतमस्य शरद्वतः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
तस्याथ युधि विक्रम्य भार्गवः परवीरहा ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
तस्याद्य कर्मणः कर्णः फलं प्राप्स्यति दारुणम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचो मय़ा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
तस्याद्य गृध्राः श्येनाश्च वडगोमाय़वस्तथा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
तस्याद्य धर्मराजस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तस्याद्य न प्रपश्यामि प्रतिय़ोद्धारमाहवे |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याद्य भार्या भगिनी ममेय़ं; कृष्णा भवित्री न मृषा व्रवीमि ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तस्याद्य वसुधा राजन्निखिला भरतर्षभ |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
तस्याद्य विप्रलम्भस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
तस्याद्य व्यसने वुद्धिः सञ्जातेय़ं ममाधमा |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पास्यति शोणितम् |
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पिवति शोणितम् ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याधः स्रोतसोऽपश्यद्वारि भूरि द्विजोत्तमः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य गुणा नश्यन्ति साधवः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य दोषान्पश्यन्ति साधवः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याधर्मप्रवृत्तस्य हिंसकस्य दुरात्मनः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
तस्याधर्मस्य गान्धारे फलं प्राप्तमिदं त्वय़ा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
तस्याधिष्ठानमव्यग्रं व्रूहि सर्प यथातथम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
तस्यानु दमय़न्ती च ववन्दे पितरं शुभा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
तस्यानुकम्पय़ा देवी प्रीता समभवत्तदा |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
तस्यानुवन्धं स द्रष्टा धृष्टद्युम्नः सुदारुणम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तस्यानुवन्धः प्राप्तस्त्वां पुत्राणां राज्यकामुकम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तस्यानुशय़मूलस्य मूलमुद्ध्रिय़ते वलात् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
तस्यान्तगमनं श्रेय़ः कीर्तिरेषा सनातनी ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तस्यान्तमिषुभी राजन्यदा द्रौणिर्न जग्मिवान् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
तस्यान्तरं स दृष्ट्वैव पर्यवर्तत खेचरः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
तस्यान्तरिक्षं पृथिवी दिवं च; सर्वं वशे तिष्ठति शाश्वतस्य ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
तस्यान्तरीय़मादाय़ जग्मुः सर्वे विहाय़सा ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
तस्यान्तवन्तश्च भवन्ति लोका; न चास्य तद्व्रह्म फलं ददाति ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तस्यान्ते चापुनर्भावे वुद्धिस्तव भविष्यति ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
तस्यान्ववाय़े द्वौ राजन्राजानौ सम्वभूवतुः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
तस्यान्वय़े चापि ततो महर्षिः; पराशरो नाम महाप्रभावः |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तस्यापकृष्टशीर्षं तच्छरीरं पतितं रथात् |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
तस्यापकृष्य तद्राज्यं मम शीघ्रं प्रदीय़ताम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१३६
भरद्वाज उवाच
तस्यापचक्रे मेधावी तं शशाप स वीर्यवान् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
तस्यापचितिमार्यत्वात्कर्तारः स्थविरास्त्रय़ः ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
तस्यापचितिमिच्छामि त्वद्दिष्टो गन्तुमीश्वर ||
७ ग