द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तस्याश्वान्रथशक्त्यासौ तदा क्रुद्धः पराक्रमी |
१४२ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
तस्याश्वो व्यचरद्भूमिं पुत्रैः सुपरिरक्षितः ||
९ ग
विराट पर्व
अध्याय
९
सहदेव उवाच
तस्याष्टशतसाहस्रा गवां वर्गाः शतं शताः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याष्टौ वसवः पुत्रास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यासनार्थं विप्रर्षेर्वालस्यापि वशे स्थिताः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
तस्यासीत्प्रतिवुद्धस्य शोकेन पिहितात्मनः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
तस्यासीद्वै मातुलः श्वेतकेतुः; स तेन तुल्यो वय़सा वभूव ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यासीन्न विषेणेदमुदकं दूषितं यथा |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यासून्पावकस्पर्शैः सौमित्रिः पत्रिभिस्त्रिभिः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्ततस्तावभिवाद्य पादा; वुक्त्वा च कृष्णामभिवादय़ेति |
८ क
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
तस्यास्तत्प्रिय़माख्यानं प्रव्रवीहि महामते |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
तस्यास्तथोपचारेण रूपेणाप्रतिमेन च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यास्तदाक्षिप्य वचो हितमुक्तं कपीश्वरः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा राक्षस्यस्ताः खरस्वनाः |
५२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुर्लोकनमस्कृतः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यास्तपःप्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तस्य च यत्कार्यं क्रिय़तां तदनन्तरम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्तां चक्ररक्षौ द्वौ सैन्धवस्य वृहत्तमौ |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
तस्यास्तां हंसडिभकावशस्त्रनिधनावुभौ |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्ताः कृपणा वाचः कृष्णाय़ाः परिदेविताः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तीक्ष्णेन भल्लेन पृथुधारेण पाण्डवः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तु जातकर्मादि कृत्वा सर्वं तपोधनः |
५९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तु तं स्थिरं ज्ञात्वा व्यवसाय़ं कुरुस्त्रिय़ः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तु तपसोग्रेण महान्कालोऽत्यगान्नृप ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तु तेन वृत्तेन तपसा च विशां पते |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तु योजनाद्गन्धमाजिघ्रन्ति नरा भुवि ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्तु शीलवृत्तेन तुतोष द्विजसत्तमः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
तस्यास्तुल्यं पतिं सोम उतथ्यं समपश्यत ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
भीमसेन उवाच
तस्यास्ते वचनं श्रुत्वा अनृणा विचरन्त्युत ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्त्रमस्त्रैरभिहत्य सङ्ख्ये; शरोत्तमैः पातय़िष्यामि पार्थम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
तस्यास्त्रवर्षाण्यहमुत्तमास्त्रै; र्विहत्य सर्वाणि रणेऽभिभूय़ |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्त्रस्य विघातार्थं तत्तत्स कुरुतेऽर्जुनः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्त्राण्यस्त्रमाय़ाभिः प्रतिहन्य स सात्यकिः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
तस्यास्त्वं सपरीवारो मूढ दासत्वमागतः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्त्वग्रे महेष्वासः पाञ्चाल्यो युद्धदुर्मदः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्थिभिरथो शक्रः सम्प्रहृष्टमनास्तदा |
३० क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
तस्यास्थिभिर्महाघोरं वज्रं सम्भ्रिय़तां दृढम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
तस्यास्थिभिर्वज्रं क्रिय़तामिति ||
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्माभिर्न शकितस्त्रातुमद्यात्मजो भय़ात् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
तस्यास्मि दुहिता पार्थ उलूपी नाम पन्नगी ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
तस्यास्य भावय़ुक्तस्य निमित्तं देहभेदने ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
तस्यास्य यत्नाच्चरतस्त्रैलोक्यममरद्युते |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्यतः सुनिशितान्पीतधारा; न्द्रौणेः शरान्पृष्ठतश्चाग्रतश्च |
६२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्यतस्तानभिनिघ्नतश्च; ज्यावाणहस्तस्य धनुःस्वनेन |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्यतो धनुर्भीमश्चकर्त निशितैस्त्रिभिः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
तस्यास्यमभवद्घोरं तीक्ष्णाग्रदशनं महत् |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तस्यास्यान्नासिकाभ्यां च श्रवणाभ्यां च सर्वशः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यास्ये यौवनाश्वस्य पाणिरिन्द्रस्य चास्रवत् ||
७८ ख