आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
तदिन्द्रजालप्रतिमं वाणजालममित्रहा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
तदिन्द्रसेनस्त्वरितं प्रगृह्य; जघन्यमेवोपय़यौ रथेन ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
तदिन्द्रिय़ाणि संय़म्य तपो भवति नान्यथा ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
तदिष्टे ते मय़ैवैते दत्ते स्वे मणिकुण्डले |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
तदिहाप्सरसस्तात गन्धर्वाश्च सदानघ |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
तदीदृशमिदं भावमवशः प्राप्य केवलम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
तदुक्तं वेदवादेषु गहनं वेददर्शिभिः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तदुक्तोऽहमदीनात्मन्राज्ञामितपराक्रम |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तदुग्रनादं वहुरूपवर्णं; तवात्मजानां समुदीर्णमेवम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिपाः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिपाः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
तदुच्यतां महाभागा इति जातघृणोऽव्रवीत् ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तदुच्यतां महावाहो कं कामं प्रदिशामि ते |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तदुत्तमेषून्मथितं विषाग्निना; प्रदीप्तमर्चिष्मदभिक्षिति प्रिय़म् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तदुत्पिञ्जलकं युद्धमासीद्देवासुरोपमम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
तदुत्सव इवोदग्रं सम्प्रहृष्टनरावृतम् |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तदुत्सवमदोदग्रं हृष्टनारीनराकुलम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तदुत्सृज्य धनुश्छिन्नं चेदिराजो महारथः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तदुत्सृज्य धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा |
५० ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
तदुदस्तमलातं तु भीमः प्रहरतां वरः |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
तदुदारं महाघोषं सपत्नगणसूदनम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
तदुदीर्णं महत्सैन्यं त्रैलोक्यस्यापि सञ्जय़ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
तदुदीर्णगजाश्वौघं वलं तव जनाधिप |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तदुदीर्णरथाश्वं च पत्तिप्रवरकुञ्जरम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
तदुद्धतं शैल इवाप्रकम्प्यो; वर्षं महच्छैलसमानसारः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तदुद्धूतं वलं दृष्ट्व रथनागाश्वपत्तिमत् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तदुद्यतगदाप्रासमकापुरुषसेवितम् |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तदुद्यतादित्यसमानवर्चसं; शरन्नभोमध्यगभास्करोपमम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तदुपश्रुत्य ते कर्म वासुदेवस्य धीमतः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
तदुपश्रुत्य धर्मात्मा शुकः शक्रेण भाषितम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
तदुपश्रुत्य मघवा प्रणिपत्य पितामहम् |
४८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
तदुपस्थितमेवात्र वचनान्ते प्रदृश्यते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
७६
नल उवाच
तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
तदुपादीपय़द्भीमः शेते यत्र पुरोचनः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तदुपालम्भसंय़ुक्तं श्रावितः किल पार्थिवः |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
तदुपाश्रित्य वीर्यं च युध्येय़मपि वासवम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
तदुभय़मुपलक्षय़न्निवाहं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेय़ोऽहमाप्नुय़ाम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तदेकस्मिन्नधिष्ठाने संवादः श्रूय़तामय़म् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
तदेकाग्रमना राजन्निवोध गदतो मम ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तदेकाग्रमनास्तात शृणु तीर्थेषु यत्फलम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
तदेकाय़नमासाद्य विषमं भीमदर्शनम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
युधिष्ठिर उवाच
तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुकुलोद्वह |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
करालजनक उवाच
तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि नानात्वैकत्वदर्शनम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
व्यास उवाच
तदेतत्कथितं जन्म मय़ा पूर्वकमात्मनः |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तदेतत्कथितं सर्वं मय़ा वो मुनिसत्तमाः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
तदेतत्खचरं दिव्यं चरत्यमरवर्जितम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
तदेतत्त्रिषु लोकेषु धनं तिष्ठति शाश्वतम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
तदेतत्समतिक्रान्तं पूर्वमेव विशां पते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
तदेतत्सम्प्रदृश्यैव कर्मभूमिं प्रविश्य ताम् |
८९ क