chevron_left  तस्योद्यतासेःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तस्योद्यतासेः सुनसं शिरः काय़ात्सकुण्डलम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्योदय़ं चास्तमय़ं च वीरा; स्तत्र स्थितास्ते ददृशुर्नृसिंहाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
तस्योपकारे निय़तामिमां वाचमुवाच ह ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
तस्योपदेशं पश्यामि यथावत्तन्निवोध मे |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तस्योपरि सपत्नस्य वद्धस्य मनसा हसन् ||
२८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
तस्योपलक्षय़े कृष्ण कार्ष्णेरमिततेजसः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
तस्योपविष्टस्य ततो विश्रान्तस्योपशृण्वतः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
तस्योपविष्टस्य मुनेरुत्सङ्गे निपपात ह |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
तस्योपाय़ं प्रवक्ष्यामि पुरस्तात्तं निवोधत ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
तस्योरस्तूर्णमासाद्य जत्रुदेशे विभिद्य तम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तस्योरुवाताभिहता ताम्रपल्लववाहवः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्योर्ध्वमगमन्प्राणाः संनिरुद्धा महात्मनः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तस्योर्ध्ववाहोः सदृशं रूपमासीन्महात्मनः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजाय़ते ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
ता इमा विप्रमुख्येभ्यो यो ददाति महीपते |
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि वलादितः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
ता एकवस्त्रा निर्लज्जाः श्वश्रूणां पुरतोऽभवन् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
ता एताद्यापि कृष्णस्य तपसा तेन दीपिताः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ता गत्वा पितरं प्राहुः प्रजापतिमतन्द्रिताः |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
ता गाथाः शृणु मे शल्य मद्रकेषु दुरात्मसु ||
७१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
ता गावः प्रस्नुता वत्सैः शोणितं प्रक्षरन्त्युत ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
ता जातमात्रा नृत्यन्ति गाय़न्ति च हसन्ति च ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
ता जाह्नवीजलं क्षिप्रमवगाहन्त्वतन्द्रिताः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४९
स्थाणुरु उवाच
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
ता दृष्ट्वा रहिता गास्तु कचेनाभ्यागता वनात् |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
ता देवसैन्यान्यदहन्वेष्टमानानि भूतले ||
९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
ता नदीः सिन्धुमासाद्य शीलवान्स्वर्गमाप्नुय़ात् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
ता नद्यो घोररूपाश्च नय़न्त्यो यमसादनम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ता निकृत्य शितैर्वाणैस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
ता निशम्य तदा वाचः सर्वय़ोधैरुदाहृताः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
ता भाविता भावय़न्ति हव्यकव्यैर्दिवौकसः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ता भुजाग्रैर्महावेगा विसृष्टा भुजगोपमाः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
ता राजभय़भीताश्च शापभीताश्च योषितः |
३२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ता वाचः सा तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नृप |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
ता वाचः सूतपुत्रस्य तथा युक्ता निशम्य तु |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
ता विहृत्य यथाकामं भुक्त्वा पीत्वा च भारत |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
ता वै रुद्रमजानन्त्यो याथातथ्येन देवताः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ता वै व्रह्मर्षय़ः सर्वाः प्रजार्थं प्रतिपेदिरे ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०९
वर्गो उवाच
ता वय़ं चिन्तय़ित्वैवं मुहूर्तादिव भारत |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ता वय़ं सहिताः सर्वास्त्वत्सकाशे प्रजेश्वर |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तां कङ्कमालावृतगृध्रकह्वैः; क्रव्यादसङ्घैश्च तरक्षुभिश्च ||
१२४ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तां कथां स्मारय़ामास सात्यकिर्मधुसूदनम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
तां कन्यां चिन्तय़न्तो वै किं कार्यमिति धर्मिणः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
तां कन्यां रूपसम्पन्नां स्वगृहे संन्यवेशय़त् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
तां कन्यामङ्कमारोप्य पर्याश्वासय़त प्रभो ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
तां कम्पय़ित्वा भगवान्प्रह्रादमिदमव्रवीत् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
तां कर्णभुजनिर्मुक्तामर्कवैश्वानरप्रभाम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
तां कर्णोऽभ्यवदत्प्रीतस्ततस्तौ जग्मतुः पृथक् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
तां कश्यपस्यानुमते व्राह्मणाः खण्डशस्तदा |
१३ क