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शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तां कालरात्रीमिव पाशहस्तां; यमस्य धात्रीमिव चोग्ररूपाम् |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपक्षे परामृशत् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तां कुरूणां प्रविततां शस्त्रवृष्टिं समुद्यताम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
तां कृशां च विवर्णां च दृष्ट्वा चिन्तासमन्विताम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
तां कृष्णां कृष्णमहिषी चकाराभिप्रदक्षिणम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
तां कृष्यमाणां च रजस्वलां च; स्रस्तोत्तरीय़ामतदर्हमाणाम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
तां क्रमेण महावाहो यथावज्जय़ पार्थिव ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
तां क्रोशन्तीं पृथा दुःखादनुवव्राज गच्छतीम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
तां क्षमामीदृशीं कृष्णे कथमस्मद्विधस्त्यजेत् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
तां गच्छन्तीमन्वगच्छत्तदानीं; सोऽपश्यदारात्तरुणं दर्शनीय़म् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तां गच्छेय़ं गतिं घोरां न चेद्धन्यां जय़द्रथम् ||
३० ग
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तां गच्छेय़ं गतिं घोरां न चेद्धन्यां जय़द्रथम् ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
तां गतिं परमामेति निवृत्तिपरमो मुनिः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १३
पितर ऊचुः
तां गतिं प्राप्नुवन्तीह पुत्रिणो यां व्रजन्ति ह ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
तां गतिं लभते दत्त्वा द्विजस्यान्नं विशां पते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
तां गाधिः कविपुत्राय़ सोर्चीकाय़ ददौ प्रभुः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
भीष्म उवाच
तां गामृषिः स्यूमरश्मिः प्रविश्य यतिमव्रवीत् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तां च चिक्षेप सङ्क्रुद्धः फल्गुनस्य रथं प्रति ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तां च तारापतिमुखीं तारां निपतितेश्वराम् ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तां च दृष्ट्वा भृशं प्रीतः कुणिर्गार्ग्यो महाय़शाः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
तां च दृष्ट्वा वरारोहां श्रीमतीं चारुहासिनीम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
तां च दृष्ट्वैव कल्याणीं कल्याणाभिजनो नृपः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
तां च दृष्ट्वैव कौन्तेय़ो भीमसेनो महावलः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
तां च धर्मेण सम्प्राप्य पालय़ेय़मतन्द्रितः ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २९
भीष्म उवाच
तां च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
तां च भोगवतीं पुण्यामृषिकान्तां जनार्दन |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
तां च माय़ां तदा दृष्ट्वा घोरां नागेन वञ्चितः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
तां च रात्रिं नृपकुले वर्तय़ामास भारत ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
तां च शप्तवतीमेवं साक्षाल्लोकपितामहः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
तां च सेनामतिक्रम्य कलिङ्गानां दुरत्ययाम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
तां चाथ दृष्ट्वा नलिनीं विशोकाः; पाण्डोः सुताः सर्वनरप्रवीराः |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तां चापदं घोरतरां प्रवदन्ति मनीषिणः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
तां चापि जघ्निवान्माय़ां राक्षसस्य दुरात्मनः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
तां चापि जातां सुश्रोणीं वागुवाचाशरीरिणी |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
तां चापि वुद्धिं पापिष्ठां वर्धय़न्त्यस्य मन्त्रिणः |
७ क
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
तां चाप्यनाथामिव वीरनाथां; कृष्णां परिक्लेशगुणेन युक्ताम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
तां चाप्येषां योषितं लोककान्तां; श्रिय़ं भार्यां व्यदधान्मानुषेषु ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तां चाभिगम्य राजेन्द्र पुण्याँल्लोकानवाप्नुय़ात् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तां चार्जुनः प्रत्यगृह्णात्सुतार्थे; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११५ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
तां चावस्थां गमितं सूतपुत्रं; श्रुत्वा पार्था जहृषुः काननस्थाः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
भीष्म उवाच
तां चाव्रवीदय़ं ते स पुत्रहा पन्नगाधमः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तां चासीनौ ददृशतुर्भीमसेनय़ुधिष्ठिरौ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
तां चेच्छक्ष्यस्यनुष्ठातुं कर्म चैव करिष्यसि |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
तां चेदहं न दित्सेय़ं त्वद्गुणैरुपवृंहिताम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
तां चैव प्रकृतिं प्राप्य एकीभावगतोऽभवत् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तां चैव भार्यां धर्मज्ञः पूजय़ामास धर्मतः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
तां चैव वृद्धां परिविष्य तांश्च; नरप्रवीरान्स्वय़मप्यभुङ्क्त ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
तां छित्त्वा समरे कर्णस्त्रिभिर्भारत साय़कैः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
तां जहार वलाद्राजा मूढवुद्धिर्जय़द्रथः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
तां जित्वा न वृथा राजंस्त्वं परित्यक्तुमर्हसि ||
३ ख