कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तां ज्वलन्तीमिवाकाशे शरैश्चिच्छेद सप्तभिः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
तां तथा कुर्वतीं तत्र तपः परमदुश्चरम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
तां तथा मानुषं रूपं विभ्रतीं सुमनोहरम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
तां तथा मोहसम्पन्नां विदुरः सर्वधर्मवित् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
तां तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं सुमध्यमाम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
तां तथा विकृतां दृष्ट्वा रावणः क्रोधमूर्छितः |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
तां तथा शोभितां माल्यैर्वासोभिश्च महाधनैः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
तां तां कुर्याद्विकुर्वाणः स्वय़मात्मानमात्मना ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
तां तां योनिं व्रजेद्विप्रो यस्यान्नमुपजीवति ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
तां तामलम्वुसो राजन्माय़यैव निजघ्निवान् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९१
वैशम्पाय़न उवाच
तां तिग्मांशुस्तेजसा मोहय़ित्वा; योगेनाविष्यात्मसंस्थां चकार |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
तां तीर्णः सर्वतोमुक्तो विपूतात्मात्मविच्छुचिः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
तां तु दृष्ट्वा निपतितां हतवन्धुपरिच्छदाम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
तां तु दृष्ट्वा महादेवीं तप्यमानां महत्तपः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तां तु दृष्ट्वा समृद्धिं ते वीथ्यां तस्यां नरोत्तमाः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
तां तु पद्मपलाशाक्षीं ज्वलन्तीमिव तेजसा |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
तां तु पुष्करिणीं रम्यां पद्मसौगन्धिकाय़ुताम् |
५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तां तु प्रपतितां दृष्ट्वा भीमसेनो महावलः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
तां तु रक्षस्ततो व्रह्मन्हृच्छय़ेनाभिपीडितम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
तां तु लक्ष्मीवतो लक्ष्मीं तदा यज्ञविधानजाम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
तां तु वन्धुजनः सर्वः प्रहृष्टः प्रत्यपूजय़त् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
तां तु शक्तिं तदा घोरां तव पुत्रस्य सात्यकिः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तां तु शक्तिं महावीर्यां दोर्भ्यामाय़म्य भारत |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तां तु सेनां तदा भीमो दर्शय़न्पाणिलाघवम् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तां तु सेनां भृशं विद्ध्वा द्रावय़ित्वार्जुनः शरैः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तां तु सेनां महाराज मद्रराजः प्रतापवान् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
तां तूपय़ात्वा राजेन्द्र शाल्वः सौभपतिस्तदा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
तां ते कन्यां व्यसुं दृष्ट्वा भुजगस्य विषार्दिताम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
तां तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छसि वै द्विज ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
तां त्वं धृतिं वीर पुनर्गृहीत्वा; सहानुवन्धं जहि सूतपुत्रम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तां त्वं पुरुषकारेण वुद्ध्या चैवोपपादय़ ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
तां त्वकामय़त श्रीमान्वरुणः पूर्वमेव ह |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
वसिष्ठ उवाच
तां त्वां संवरणस्यार्थे वरय़ामि विभावसो ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तां त्वेव मन्ये वृहतीं दुष्प्रधृष्यां; यस्या नेतारौ केशवश्चार्जुनश्च ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
तां ददर्श तदा गृध्रो जटाय़ुर्गिरिगोचरः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
तां ददर्श पुरे तस्मिन्विचरन्तीं यदृच्छय़ा ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
तां ददर्श समुत्सृष्टां नदीतीरे महानृषिः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
तां ददर्श स्वय़ं व्रह्मा सर्वलोकपितामहः |
५ क
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
तां ददर्शार्जुनो धीमान्विहीनां वृष्णिपुङ्गवैः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
तां दधार हरो राजन्गङ्गां गगनमेखलाम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
तां दर्शय़ स्थिरो भूत्वा न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
तां दिदृक्षुरहं योगाच्चतुर्मूर्तित्वमागतः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तां दिव्यवपुषं दृष्ट्वा तस्यर्षेर्भावितात्मनः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
तां दिव्यामद्भुतां चित्रामृद्धिमत्तामरिन्दमः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
तां दीप्तां प्रभय़ा दृष्ट्वा भगवान्पाकशासनः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तां दृष्ट्वा गालविः प्रीतो दीपय़न्तीमिवात्मना |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
भीष्म उवाच
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं पप्रच्छाप्सरसं मुनिः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं यानस्थां शोककर्शिताम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तां दृष्ट्वा चिन्तय़ामास शन्तनुः पुरुषर्षभः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद्भीताः प्रदुद्रुवुः |
१११ क