शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
तं गङ्गा सरितां श्रेष्ठा मेरुपृष्ठे जनेश्वर |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
तं गच्छ द्विजमुख्य त्वं मम वाक्यप्रचोदितः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
तं गच्छ पुरुषव्याघ्रं व्यपनीय़ेह किल्विषम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
तं गच्छ भार्गवश्रेष्ठं कालाग्निसमतेजसम् |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
तं गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाञ्छति वृहस्पतिः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
तं गच्छ शरणं देवं सर्वादिं भुवनेश्वरम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
तं गच्छाम्यहमद्यैव धर्मं प्रष्टुं तपोधनम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
तं गतस्तत्र मे शङ्का हन्यात्तं स द्विजाधमः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
तं गतासुमतिक्रम्य कृत्वा कर्णः प्रदक्षिणम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
तं गत्वा दशतां कश्चिद्भुजगः स मरिष्यति |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
तं गत्वा सहिताः सर्वे वरं वै सम्प्रय़ाचत |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
तं गन्धर्वा अप्सरसश्च नित्य; मुपतिष्ठन्ते विवुधानां शतानि |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
तं गह्वरे प्रकाशे वा पोथय़िष्यामि कीचकम् |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तं गृध्राः पर्यवीजन्त दावाग्निपरिकालितम् ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
तं गृहीत्वा ततो राजा शिरस्येवाकरोत्तदा |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तं गृहीत्वा तु कौरव्य नागराजपतेः सुता |
३ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
तं गृहीत्वा नलः प्राय़ादुद्देशं दाववर्जितम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
तं गृहीत्वा सुवर्णं च यय़ौ द्रुततरं द्विजः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
तं गौतमः प्रत्युवाच विज्ञाय़ास्य विवक्षितम् |
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
तं च तन्तुं शनैराखुमाददानं विलाश्रय़म् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
तं च तूवरकं मूढं वह्वाशिनमविद्यकम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तं च दीप्तं शरं घोरमाय़ान्तं मृत्युमात्मनः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तं च दृष्ट्वा क्रिय़ोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं च देशं वशे स्थापय़ामास ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय
३२
शेष उवाच
तं च द्विषन्ति तेऽत्यर्थं स चापि सुमहावलः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
तं च नादं ततः श्रुत्वा पुत्रास्ते हृषिताभवन् ||
२२ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
तं च पापं न जानीमो यदि दग्धः पुरोचनः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
तं च पापसमाचारं सहामात्यं सुय़ोधनम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
तं च पार्थिवशार्दूलमानय़ामास तत्पुरम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं च पुरुषोऽधिरूढः |
१७१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
तं च प्राप्तवती कृष्णा न सा भेदय़ितुं सुखम् ||
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तं च प्राप्य महीपालं कृतकृत्या भविष्यसि ||
२४ ग
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे व्यवस्थितम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तं च भीमोऽतुदद्वाणैस्तदासीत्तुमुलं महत् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
तं च मत्रमय़ं वन्धं वर्म चाङ्गिरसे ददौ ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
तं च मौनव्रतधरं श्रुत्वा मुनिवरं तदा |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
तं च यज्ञं तथाभूतं दृष्ट्वा पार्थस्य मातुल |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
तं च वालं सुवलिनं चिन्तय़ामास राक्षसी ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
तं च विक्रेतुमिच्छन्ति न वृथा वृत्तिरिष्यते |
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तं च वृद्धं तथा दग्धं हतपुत्रं नराधिपम् |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तं च व्यूहं विधास्यामि न तरिष्यन्ति यं परे |
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तं च व्यूहं विधास्यामि योऽभेद्यस्त्रिदशैरपि |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
तं च व्रूहि नरश्रेष्ठ सर्वं सम्पादय़ामि ते ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
तं च शव्दं विदुरस्तत्त्ववेदी; शुश्राव घोरं सुवलात्मजा च |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
तं च शव्दमसंसह्यं तस्याः संलक्ष्य मारिष |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
तं च शापमनुस्मृत्य पर्यतप्यद्भृशं तदा ||
२३ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तं च श्रुत्वा महेष्वासं प्रविष्टं सलिलह्रदम् |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
तं च सञ्चिन्त्य वै स्वप्नमवापं हर्षमुत्तमम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
तं च सर्वासु वेलासु भक्ष्यभोज्यप्रतिश्रय़ैः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
तं च हत्वेतरान्सर्वान्हन्तुकामो महावलः ||
२२ ख