शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
ततः कदाचित्तांस्तत्र पश्यन्पक्षीन्यतव्रतः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
ततः कदाचित्ते राजन्दीप्तमादित्यवर्चसम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
ततः कदाचित्तौ राजा महात्मानौ तथागतौ |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः कदाचित्पश्यामि तस्मिन्सलिलसम्प्लवे |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
ततः कदाचित्स मुनिर्वर्षास्वाकाशमास्थितः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
ततः कदाचित्समय़े कस्मिंश्चिन्मत्स्यजीविनः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
ततः कदाचिदपरो द्विजस्तं देशमागमत् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ततः कदाचिदुपाध्याय़ आय़ोदो धौम्यः शिष्यानपृच्छत् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाद्वले |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
ततः कदाचिद्गङ्गाय़ाः कच्छे स नृपसत्तमः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
ततः कदाचिद्देवेन्द्रो दिव्यरूपवपुर्धरः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्धरिसम्प्रय़ुक्तं; महेन्द्रवाहं सहसोपय़ातम् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्भगवानुत्तङ्कस्तोय़काङ्क्षय़ा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
ततः कदाचिद्भगवान्पर्वतोऽनुससार ह |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्भुञ्जाने प्रववौ वाय़ुरर्जुने |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्भैक्षाय़ गतास्ते भरतर्षभाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४
नारद उवाच
ततः कदाचिद्राजानः समाजग्मुः स्वय़ंवरे |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्राजेन्द्र काष्ठान्यानय़ितुं यय़ौ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
ततः कदाचिद्रामस्तु चरन्नाश्रममन्तिकात् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
ततः कदाचिद्विनतां प्रवणां पुत्रसंनिधौ |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
ततः कदाचिद्विन्ध्यस्य पृष्ठे समशिलातले |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्व्रह्माणमुपासां चक्रिरे सुराः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
ततः कदाचिन्निर्वेदान्निकारान्निकृतेन च |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
ततः कदाचिल्लिखितः शङ्खस्याश्रममागमत् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ततः कनकपुङ्खां तां शल्यक्षिप्तां विय़द्गताम् |
३८ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कनकपुङ्खाग्रैर्वीरः संनतपर्वभिः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कनकपुङ्खानां शरवृष्टिं समुत्थिताम् |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कनकपुङ्खानां शराणां नतपर्वणाम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
ततः कनकपुङ्खानां शराणां नतपर्वणाम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ततः कनखले स्नात्वा त्रिरात्रोपोषितो नरः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततः कन्याश्रमं गच्छेन्निय़तो व्रह्मचर्यवान् |
१६५ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कन्यासहस्रेण वृता शिविकय़ा तदा |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
ततः कपिध्वजो राजन्हत्वा संशप्तकान्रणे |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ततः कपिर्महानादं सह भूतैर्ध्वजालय़ैः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कमलपत्राक्षं कृष्णं लोकनमस्कृतम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
ततः कमलपत्राक्षः सिंहदंष्ट्रो महावलः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततः कमलषण्डानि शल्लकीगहनानि च |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
ततः कर्कोटको नागः सान्त्वय़न्नलमव्रवीत् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं द्वादशभिः सुमुक्तै; र्विद्ध्वा पुनः सप्तभिरभ्यविध्यत् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं पुरस्कृत्य त्वदीय़ा युद्धदुर्मदाः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं महाराज वारय़ित्वा शिलीमुखैः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं शरव्रातैः कुरूनन्यान्सहस्रशः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं शिनेः पौत्रः सर्वपारशवैः शरैः |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं समुत्सृज्य भैमसेनिरपि प्रभो |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं समुद्दिश्य त्वरमाणो धनञ्जय़ः |
८६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णः कुरुभिः पूज्यमानो; यथा शक्रो वृत्रवधे मरुद्भिः |
६३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णः कुरुषु प्रद्रुतेषु; वरूथिना श्वेतहय़ेन राजन् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णः कृपो द्रोणो द्रौणिर्गान्धारराट्शलः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णः प्रथमं तत्र पार्थं; महेषुभिर्दशभिः पर्यविध्यत् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः कर्णः प्रहृष्टस्तु उपसङ्गम्य वासवम् |
२० क