भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तां दृष्ट्वा तादृशीं माय़ां राक्षसस्य महात्मनः |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तां दृष्ट्वा तु नरव्याघ्रो द्रोणेन निहतां शरैः |
१३५ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
तां दृष्ट्वा दर्शनीय़ाङ्गीं देवराजसुतामिव |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
तां दृष्ट्वा देवकीं शौरे रथस्थां पुरुषर्षभः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तां दृष्ट्वा देवगर्भाभां चरन्तीं देवतामिव |
४ क
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
तां दृष्ट्वा द्वारकां पार्थस्ताश्च कृष्णस्य योषितः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रिय़ं परमिकामहम् |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तां दृष्ट्वा पुरुषा राजन्प्राद्रवन्त दिशो दश |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तां दृष्ट्वा मुनय़स्तुष्टा वेगय़ुक्तां सरस्वतीम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मार्कण्डेय़ उवाच
तां दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य माय़ामिक्ष्वाकुनन्दनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
तां दृष्ट्वा विद्रुतां सेनां वासुदेवधनञ्जय़ौ |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
तां दृष्ट्वा विनिवृत्तस्त्वं ततः पाणिं ग्रहीष्यसि |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तां दृष्ट्वा सीदतीं सेनां पङ्के गामिव दुर्वलाम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाभूद्विस्मितो रूपसम्पदा |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
तां देवगुप्तामिव देवमाय़ां; हित्वा प्रय़ातः क्व नु धर्मराजः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
तां देवदेवः प्रीतात्मा पुनः प्राह शुभं वचः ||
४५ ग
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
तां देवसमितिं तस्य वासवश्च विशां पते |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
तां देवो दर्शय़ामास शूलपाणिरुमापतिः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तां द्रोणो नवभिर्वाणैश्चिच्छेद युधि भारत |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
तां द्रौपदीं प्रेक्ष्य तदा स्म सर्वे; कन्दर्पवाणाभिहता वभूवुः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तां धारय़ामास पुरा दुर्धरां पर्वतैरपि |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तां धृतिं कुरु राधेय़ ततः प्रत्येहि पाण्डवम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तां न देवा न गन्धर्वा नासुरोरगराक्षसाः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
तां नदीं क्षत्रिय़ाः शूरा हय़नागरथप्लवैः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तां नदीं पितृलोकाय़ वहन्तीमतिभैरवाम् |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
तां नराः परिधावन्तीं स्त्रिय़श्च समुपाद्रवन् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
तां नामर्षय़त श्रीमांस्ततस्तूर्णमचोदय़त् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तां नामृष्यत कौरव्यो गदां प्रतिहतां रणे |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तां नावमिव पर्यस्तां भ्रान्तवातां महार्णवे |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
तां निर्विकारां दृष्ट्वा तु पुनरेव शचीपतिः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तां निशां दुःखशोकार्तौ श्वसन्ताविव चोरगौ |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभय़ावहाम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
भीष्म उवाच
तां निय़ुक्तामदीनात्मा सत्त्वस्थः समय़े रतः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
तां पतन्तीं महावेगां दृष्ट्वा तेजोभिसंवृताम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
तां पतन्तीं वरारोहां सज्जमानां लतामिव |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
तां पर्वतस्ततो दृष्ट्वा प्रद्रवन्तीमनिन्दिताम् |
३९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
तां पश्य रुदतीमार्तां मुक्तकेशीमधोमुखीम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
तां पश्यमानो विजने स रेमे परमद्युतिः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
कर्ण उवाच
तां पालय़ यथा शक्रो हतशत्रुर्महामनाः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तां पूजां नाभ्यनन्दत्स वाक्यं चेदमुवाच ह |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
तां पूजय़ित्वा कौन्तेय़ः प्रसादमकरोत्तदा |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
तां प्रगृह्योन्नदन्भीमः सर्वशैक्याय़सीं गदाम् |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
तां प्रच्युतां ततो दृष्ट्वा देवाः सार्धं महर्षिभिः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
तां प्रत्यगृह्णात्कौन्तेय़ः सुतस्यार्थे धनञ्जय़ः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
तां प्रभग्नां चमूं दृष्ट्वा सौभद्रेणामितौजसा |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
तां प्रभाते च साय़े च पिता पप्रच्छ भारत |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तां प्रमृद्य ततः सेनां पद्मिनीं वारणो यथा |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
तां प्रशाधि महाराज स्वधर्ममनुपालय़न् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
तां प्रहृष्टेन मनसा दमय़न्ती विशां पते |
१५ क