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वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रिय़ं रक्षेत मत्सरात् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
नित्यं क्षताद्वारय़ति यो धर्मेष्वपि कर्मसु ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
नित्यं गम्भीरतोय़ाभिरापगाभिरिवोदधिः |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
कापव्य उवाच
नित्यं गोव्राह्मणे स्वस्ति योद्धव्यं च तदर्थतः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
नित्यं च पुरुषव्याघ्र धर्ममेव विचिन्तय़ |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
नित्यं च वहु दातव्यं साधुभ्यश्चानसूय़ता |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
नित्यं च समरे राजन्विजिगीषन्ति मानवान् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यं चारेण वोद्धव्यं स्थानं वृद्धिः क्षय़स्तथा ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २१३
कन्यो उवाच
नित्यं चावां प्रार्थय़ते हर्तुं केशी महासुरः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
नित्यं चास्माञ्श्वापदा व्याभषन्त; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यं जप्यपरा भूत्वा सरस्वतीमुदीरय़न् ||
१२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
नित्यं तमाहुर्विद्वांसः शुचिस्तस्माच्छुचिर्भव ||
९८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
नित्यं तस्माच्छङ्कितव्यममित्रं तं विदुर्वुधाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
नित्यं त्यक्तं राजधर्मेषु सर्वं; प्रत्यक्षं ते भूमिपालाः सदैते ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
नित्यं त्राता च हन्ता च धर्माधर्माश्रिताञ्जनान् ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
नित्यं त्रय़ाणां वर्णानां शूद्रः शुश्रूषुरुच्यते |
२ क
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
नित्यं त्वं कुरुशार्दूल कृष्णश्च मम पुत्रकः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
नित्यं दद्यादेकभक्तः सदा च; सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नित्यं दानं तथा दाक्ष्यमार्जवं चैव नित्यदा |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
नित्यं दीक्षाकृशतनुः शतक्रतुरिवापरः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
नित्यं देवपरा दान्ता दातारश्चाविकत्थनाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
नित्यं धर्मं क्षत्रिय़ो व्रह्मचारी; चरेदेको ह्याश्रमं धर्मकामः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
नित्यं धर्मरतश्चैव कृतास्त्रश्च विशेषतः |
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
नित्यं नातिचरँल्लाभे अलाभे सप्त पूरय़न् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
नित्यं नीलशिखण्डाय़ शूलिने दिव्यचक्षुषे |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
नित्यं पञ्चोपधातीतैर्मन्त्रय़ेत्सह मन्त्रिभिः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम् |
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
अरुन्धत्यु उवाच
नित्यं परिवदेच्छ्वश्रूं भर्तुर्भवतु दुर्मनाः |
७० क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या तपसा निय़मेन च ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नित्यं पर्वसु सुस्नाताः स्वनुलिप्ताः स्वलङ्कृताः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
नित्यं पाञ्चालाः सचिवास्तवेमे; जनार्दनो युय़ुधानश्च वीरः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
धृतराष्ट्र उवाच
नित्यं पाण्डुसुतान्हृष्टानभग्नांश्चैव शंससि ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
नित्यं पुण्यं च मेध्यं च नैमिषं नृपसत्तम ||
५७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
नित्यं पुनः सचिवैर्यैरवोच; द्देवानपीन्द्रप्रमुखान्सहाय़ान् |
१०२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
नित्यं पूजितमस्माभिरभिकामं च नः सदा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २२३
स्तम्वमित्र उवाच
नित्यं प्रवृद्धः पचसि त्वय़ि सर्वं प्रतिष्ठितम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
नित्यं प्रोष्ठपदाभ्यां च शुक्रे धनपतौ तथा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषय़ांश्चोपभुञ्जते |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यं भवतु ते वुद्धिरेषा राजञ्शतं समाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
नित्यं मनःसमाधाने प्रय़तेत विचक्षणः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुःखावहो मतः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
नित्यं यज्ञक्रिय़ा धर्मः पितृदेवार्चने रतिः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
नित्यं यस्तु सतो रक्षेदसतश्च निवर्हय़ेत् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
नित्यं रक्षितमन्त्रः स्याद्यथा मूकः शरच्छिखी |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
नित्यं राष्ट्रमवेक्षेत गोभिः सूर्य इवोत्पतन् |
३० क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
नित्यं विप्रतिषिद्धं तु पुरस्तादासनं महत् ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यं विप्रैः समाख्यातो नवमोऽनवमो गुणैः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
नित्यं विवरणाद्वाधस्तथा राज्यं प्रमाद्यतः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
नित्यं वुद्धिमतो ह्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते |
८४ क