अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
ताः पर्वतप्रस्रवणैरूष्मां मुञ्चन्ति भार्गव |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
ताः पूज्या भूतिकामेन प्रसृताग्रप्रदाय़िना ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ताः प्रकामं रुदित्वा च विलप्य च सुदुःखिताः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपराय़णाः |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
ताः प्रेषितास्तत्त्वभावं विदित्वा; प्रीत्या राज्ञे तच्छशंसुर्हि सर्वम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ताः शनैरिव सव्रीडं प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
ताः शीलसत्त्वसम्पन्ना वितमस्का गतक्लमाः |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ताः शोकविह्वला राजन्नुपैक्षन्त परस्परम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
ताः सभाः केशवः सर्वा रत्नानि विविधानि च |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ताः समाश्वासय़त्क्षत्ता ताभ्यश्चार्ततरः स्वय़म् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
ताः समासाद्य भगवान्सर्वभूतगणैर्वृतः |
४१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ताः समासाद्य राजानं भृशं शोकसमन्विताः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
ताः समेत्य ततश्चक्रुः समय़ानिति नः श्रुतम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
ताः सम्पूज्य महासेनः कामांश्चासां प्रदाय़ सः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
ताः सर्वा गुणसम्पन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीय़से |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
नारद उवाच
ताः सर्वाः शिरसा देवः प्रतिगृह्णाति वै स्वय़म् ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिष्ववस्थितः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
ताः सर्वास्त्वनवद्याङ्ग्यः कन्याः कमललोचनाः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
ताः सुघोरं तपः कृत्वा देव्यो भरतसत्तम |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ताः स्त्रिय़ो भरतश्रेष्ठ सौकुमार्यसमन्विताः |
७२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ताञ्जघान शितैर्वाणैः सूतपुत्रो महारथः ||
२४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ताञ्जित्वा समरे जिष्णुः संशप्तकगणान्वहून् |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
ताञ्शराञ्शकुनिस्तूर्णं चिच्छेदान्यैः पतत्रिभिः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ताञ्शराञ्शरसङ्घैस्तु संनिवार्य महारथः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
ताञ्शरान्द्रोणमुक्तांस्तु शरवर्षेण पाण्डवः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
ताञ्शरान्प्रेषितांस्तेन समन्ताद्धेमभूषणान् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ताञ्शरान्समरे राजन्वेगेनापततो वहून् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
ताञ्शरौघेण महता साश्वसूतान्महारथान् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
ताञ्शोणितपरिक्लिन्नान्विषमस्थाञ्शरातुरान् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
ताडितश्च मुनिस्तेन शरेणानतपर्वणा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ताडिता भीमसेनेन शल्यस्य महती गदा |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
ताडिता मद्रराजेन भीमस्य गदय़ा गदा |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ताडितानां च पततां निनादः सुमहानभूत् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ताडितास्ताड्यमानाश्च तोमरर्ष्टिपरश्वधैः |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ताड्यमानाः क्षितिं जग्मुर्मुक्तशस्त्राः शरार्दिताः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ताड्यमानासु भेरीषु मृदङ्गेषु नदत्सु च ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
ताडय़न्तः शितैः प्रासैश्चोदय़न्तः परस्परम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
ताडय़ामास खचरैर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
ताडय़ामास शूलेन स भिन्नहृदय़ोऽपतत् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
ताडय़ामास सङ्क्रुद्धः पार्षतं नवभिः शरैः ||
८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
ताडय़ामास सङ्क्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ताडय़ामास सङ्क्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ताडय़ामास सङ्क्रुद्धो वक्षोदेशे महावलः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
ताडय़ामास समरे तोत्त्रैरिव महागजम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
ताडय़ामास समरे स च तं प्रत्यविध्यत ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
ताडय़ामास समरे सिंहवच्च ननाद च ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
ताडय़ामासतुरुभौ विनदन्तौ मुहुर्मुहुः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
ताडय़ित्वा तु तावेव जाय़ते कच्छपो नृप ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
ताडय़िष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवद्वली ||
१२ ख