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शान्ति पर्व
अध्याय १२३
युधिष्ठिर उवाच
तात धर्मार्थकामानां श्रोतुमिच्छामि निश्चय़म् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
तात प्रत्यक्षधर्माणस्तथा याय़ावरा गणाः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तात भ्रातः सखे वन्धो वय़स्य मम मातुल |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तात मन्यामि तत्सर्वं वुध्यस्व वलमात्मनः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
तात संहत्य जीवामो मा द्विषद्भ्यो वशं गमः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १६९
गन्धर्व उवाच
तातेति परिपूर्णार्थं तस्य तन्मधुरं वचः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
तातेत्यवोचं पितरं पितुः पाण्डोर्महात्मनः ||
८७ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
तातेऽपि हि गते स्वर्गं विनष्टे च ममानुजे |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
तादृग्जनशतस्यापि यद्ददाति जुहोति च |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तादृग्यादृक्पुरा वृत्तं शम्वरामरराजय़ोः ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
तादृग्रूपमिदं कार्यं कृतं मम सुहृद्व्रुवैः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तादृग्रूपा न नारीषु भूतपूर्वा युधिष्ठिर |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
तादृङ्नराधमो लोके वर्जनीय़ो नराधिप ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ८६
यय़ातिरु उवाच
तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां; वसन्नरण्ये निय़ताहारचेष्टः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
तादृशं कर्ण यः पार्थं योद्धुमिच्छेत्स दुर्मतिः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवैहि मे ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
तादृशं खलु मे दत्तं त्वं तु तन्नाववुध्यसे ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
मेनको उवाच
तादृशं तपसा युक्तं प्रदीप्तमिव पावकम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २९८
वैशम्पाय़न उवाच
तादृशं तादृशं सर्वे छन्दतो धारय़िष्यथ ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
तादृशं तादृशेनैव स गुणं प्रतिपद्यते ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
तादृशं पश्यते वालो यस्य सत्यमनुष्ठितम् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
तादृशं भुवि वा युद्धं दिवि वा श्रुतमित्युत ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
तादृशं विद्धि सर्वेषामेको ह्येष हुताशनः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तादृशस्तद्विशिष्टो वा मद्रराजो मतो मम ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तादृशस्येदृशे काले मादृशेनाभिचोदितः ||
८९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तादृशा निहता यत्र कृत्वास्माकं जनक्षय़म् ||
१४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
मातो उवाच
तादृशा हि सहाय़ा वै पुरुषस्य वुभूषतः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
तादृशात्किल्विषाद्राजा शृणु येन प्रमुच्यते ||
९ ग
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तादृशानां सहस्राणि प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |
११० क
उद्योग पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
तादृशान्येव दुर्गाणि राज्ञामपि महीपतिः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तादृशान्येव सर्वाणि वलवन्ति दृढानि च ||
८ ग
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तादृशान्सुहृदो हत्वा मूढस्यास्य सुहृद्द्रुहः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
तादृशीमेव लभते वेदनां मानवः पुनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तादृशे मुह्यते वालो यत्र सत्यमनिष्ठितम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
तादृशे हि कुले जाता कुले चैव विवर्धिता |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
तादृशेन शमं कृष्ण मन्ये परमदुष्करम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तादृशेनैव राजेन्द्र यादृशेन घटोत्कचः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २९४
इन्द्र उवाच
तादृशेनैव वर्णेन त्वं कर्ण भविता पुनः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
तादृशैः सङ्गतं नीचैर्नृशंसैरकृतात्मभिः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तादृशो यादृशो नान्यः श्रुतो दृष्टोऽपि वा क्वचित् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
तादृशोऽय़मनुप्रश्नः स व्यवस्यस्त्वय़ा धिय़ा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तादृशोऽय़मनुप्रश्नो यत्र धर्मः सुदुर्वचः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालय़ेत् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
तानतिक्रान्तमर्यादान्नान्यः संहर्तुमर्हति |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
तानतीतोपधान्प्राज्ञान्हिते युक्तान्मनस्विनः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
तानतीत्य महाशैलान्कैरातं स्थानमुत्तमम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तानत्ति पुरुषः सर्वान्पश्य धर्मो यथागतः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तानद्य निहताञ्श्रुत्वा हृतैश्वर्यान्हृतौजसः |
८ क
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत् ||
७ ख