भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
व्रीडमाना निशाकाले पाण्डवेय़ैः पराजिताः ||
७३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडमानेव शनकैरिदं वचनमव्रवीत् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडा चात्र न कर्तव्या साहसं यदिदं कृतम् |
४३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडां जग्मुः पुरा याः स्म सखीनामपि योषितः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडाविह्वलय़ा वाचा शापत्रस्ता विशां पते ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रीडिता साभवत्साध्वी तदा भरतसत्तम |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडिता साभवद्वाला कन्याभावे रजस्वला ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडिताः परमोद्विग्नास्तूष्णीमासन्विशां पते ||
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडिताः संन्यवर्तन्त पाञ्चाल्या सहितानघाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडितान्धार्तराष्ट्रांश्च भग्नदर्पानुपागतान् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रीडय़ाभिपरीतात्मा नैराश्यमगमत्परम् ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
२४६
युधिष्ठिर उवाच
व्रीहिद्रोणः परित्यक्तः कथं तेन महात्मना |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
व्रीहिद्रोणपरित्यागाद्यत्फलं प्राप मुद्गलः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
व्रीहिद्रोणस्य तदहो ददतोऽन्नं महात्मनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
व्रीहिद्रौणिकमाख्यानं ततोऽनन्तरमुच्यते ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमैन्द्रद्युम्नं तथैव च ||
१२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
व्रुवतः सदृशं तत्र प्रोवाच मधुसूदनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
व्रुवतश्च परस्यापि वाक्यं धर्मोपसंहितम् |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
व्रुवतस्तत्र मे वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
व्रुवतामप्रिय़ं पथ्यं सुहृदां न शृणोति यः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रुवतोऽद्य महावाहो सौहृदात्परमं हितम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
व्रुवध्वं जनसंसत्सु तत्र तत्र पुनः पुनः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
व्रुवन्किरीटी तमतिप्रहृष्टो; अय़ं शरो मे विजय़ावहोऽस्तु |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६९
धृतराष्ट्र उवाच
व्रुवन्तं वाचमनृशंसरूपां; वृष्णिश्रेष्ठं मोहय़न्तं मदीय़ान् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
व्रुवन्तश्च न नो जीवन्मोक्ष्यसे जीवतामिति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
व्रुवन्तु वा महीपालाः सभाय़ां ये समासते |
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
व्रुवन्न रुच्यै भरतर्षभस्य; पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
व्रुवन्न व्यथसे स त्वं वाक्यं सत्यपराक्रम ||
९० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
व्रुवन्नपि कथां पुण्यां तत्र कीट त्वमेष्यसि ||
६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रुवन्नुच्चैर्वचस्तान्वै नाहं दुर्योधनेन वै |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रुवन्नेवं त्वराय़ुक्तः स प्राय़ादाश्रमं प्रति |
१०८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
व्रुवन्स्तेन इति स्तेनं तावत्प्राप्नोति किल्विषम् |
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्रुवाणं तु तथा पार्थं सर्वसैन्यानि मारिष |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
व्रुवाणमेवं गरुडं व्राह्मणः समभाषत |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
व्रुवाणमेवं नृपतिं यय़ातिं; नृपोत्तमो वसुमनाव्रवीत्तम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूत कर्तास्मि सर्वं वां न चिरान्मा विचार्यताम् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
जरत्कारुरु उवाच
व्रूत किं करवाण्यद्य जरत्कारुरहं स्वय़म् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
व्रूत दासीमदासीं वा तत्करिष्यामि कौरवाः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
अग्निरु उवाच
व्रूत यद्भवतां कार्यं सर्वं कर्तास्मि तत्सुराः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूत यद्वक्तुकामाः स्थ के भवन्तः किमिष्यते ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
व्रूत व्रूतेति भगवान्स्मय़मानोऽभ्यभाषत ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूहि कस्त्वं किमर्थं वा वनं त्वमिदमागतः |
७८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
व्रूहि कां वुद्धिमास्थाय़ ममत्वं वर्जितं त्वय़ा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
व्रूहि कामं च मे शेष यत्ते हृदि चिरं स्थितम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
व्रूहि कामनुसंय़ामि द्रष्टुं प्रथमतो दिशम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
तक्षक उवाच
व्रूहि काममहं तेऽद्य दद्मि स्वं वेश्म गम्यताम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
सुद्युम्न उवाच
व्रूहि कामानतोऽन्यांस्त्वं करिष्यामि हि ते वचः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
व्रूहि किं करवाणीति प्रोवाच मुनिसत्तमम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
व्रूहि किं कुर्वतः कर्म भवेद्गतिरनुत्तमा ||
१ ख