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आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
तं दृष्ट्वा शरणं जग्मुः प्रजाः सर्वा विभावसुम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ११
डुण्डुभ उवाच
तं दृष्ट्वा शापमोक्षस्ते भविता नचिरादिव ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा स वचः प्राह व्रह्मा राजन्भगीरथम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा संशय़ं प्राप्तं पीड्यमानं महारथम् |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा सर्वदैतेय़ा राक्षसा दानवास्तथा |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा सहसा यान्तं सूतपुत्रजिघांसय़ा |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा सहसाय़ान्तं वसुं ते त्वन्तरिक्षगम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय़ भर्तुर्न्यस्य शनैः शिरः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा सिंहमाय़ान्तं नागः सिंहभय़ाकुलः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा सूतपुत्रोऽय़मिति निश्चित्य पाण्डवः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
तं दृष्ट्वातिवलं चैव प्राकम्पन्त समन्ततः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तय़त्तदा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
तं दृष्ट्वावस्थितं सङ्ख्ये हरय़ः पवनात्मजम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
तं दृष्ट्वावेष्टितकरः पतत्येष गजो जलम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १६२
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वैव महात्मानं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तं देवं मनसा ध्याय़ञ्जोषमास्स्व धनञ्जय़ |
१८ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तं देवकी च भद्रा च रोहिणी मदिरा तथा |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
तं देवगन्धर्ववृतो महर्षिगणपूजितः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २९१
वैशम्पाय़न उवाच
तं देवमव्रवीद्भीता वन्धूनां राजसत्तम |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
तं देवाः कर्म कुर्वाणाः शक्रज्येष्ठा उपाश्रय़न् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
तं देवो दर्शय़ामास कृत्वा हय़शिरो महत् |
८१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
तं देशं कारपचनाद्यमुनाय़ां जगाम ह ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
तं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
तं देशमगमद्यत्र श्रीमान्रामो व्यवस्थितः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
तं देशमगमद्राजन्वदर्याश्रममाशुगः ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तं देशमुपसम्पेदे परमर्षिर्मनोजवः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
तं द्रक्ष्यसि परिभ्रष्टं तस्मात्त्वं नचिरादिव |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
तं द्रक्ष्यसि महाराज भृगुतुङ्गं महागिरिम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
तं द्रवन्तमनु प्राप्तो वनमेतद्यदृच्छय़ा |
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत ||
१५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा किमकुर्वत मामकाः ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन संय़ुगे |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणः पञ्चविंशत्या निजघान स्तनान्तरे |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणः पञ्चविंशत्या मर्मभिद्भिरजिह्मगैः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणः पञ्चविंशत्या विद्ध्वा भारत संय़ुगे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणः सधनुष्कं तु साश्वय़न्तारमक्षिणोत् |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणः सप्तसप्तत्या जघान निशितैः शरैः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणः साश्वय़न्तारं सरथध्वजमाशुगैः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणदुर्योधनवाह्लिकाश्च; तथैव दुर्मर्षणचित्रसेनौ |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणपुत्रः सङ्क्रुद्धो वाह्वोरुरसि चार्दय़त् ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणपुत्रप्रमुखा नरेन्द्राः; सर्वे समाश्वास्य सह प्रय़ान्ति |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणो द्विपदां श्रेष्ठो नाराचेन समर्पय़त् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणोऽनुय़यौ क्रुद्धो विकिरन्विशिखान्वहून् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पय़त् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या वृषसेनश्च सप्तभिः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
तं द्रौणिः समरे क्रुद्धश्छादय़ामास पत्रिभिः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
तं द्रौणिरग्रतो दृष्ट्वा स्थितं कुरुकुलोद्वह |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
तं द्रौणिरावार्य रथं कृपं स्म; समुज्जह्रे पङ्कगतां यथा गाम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
तं द्रौपदी प्रत्युवाच प्रणय़ात्कुरुनन्दनम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तं द्वादशार्धैर्नकुलो माधवश्च त्रिभिः शरैः |
४ क