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वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षय़े ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
तानुत्पतिष्णून्वुद्ध्वा तु कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
तानुदारतय़ा चाहमक्षमं तस्य दुःसहम् ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
तानुवाच जरासन्धः सत्यसन्धो नराधिपः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
तानुवाच ततः कन्या तपोवृद्धानृषींस्तदा |
२ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तानुवाच महातेजाः कौरवान्मधुसूदनः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
तानुवाच महाप्राज्ञो वासुदेवो महामनाः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
तानुवाच महाभागः सर्वलोकपितामहः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
तानुवाच महावाहुर्भीष्मः कुरुपितामहः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तानुवाच वरारोहा कच्चिद्भगवतामिह |
६६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
तानुवाच स धर्मात्मा वीभत्सुरपराजितः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
तानुवाच समेतांस्तु व्रह्मा लोकपितामहः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
तानुवाच सुरान्सर्वान्स्वय़म्भूर्भगवांस्ततः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
तानुवाच हृषीकेशः समाश्वास्य महामनाः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तानुवाचागतान्रामः प्रगृह्य सशरं धनुः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वासुदेव उवाच
तानुवाचाव्ययो देवो विहितं तत्र वै मय़ा |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
तानूचुर्व्राह्मणा राजन्पाण्डवान्व्रह्मचारिणः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
तानृषीन्सुमहाभागानन्तर्धानगतानपि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
तानेव च यथा दस्यून्क्षिप्त्वा गच्छेच्छिवां दिशम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १३४
अष्टावक्र उवाच
तानेव धर्मानय़मद्य वन्दी; प्राप्नोतु गृह्याप्सु निमज्जय़ैनम् ||
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
अश्वत्थामो उवाच
तानेवं भिन्नमर्यादान्किं भवान्न विगर्हति ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
तानेवं वदतो विप्रानर्जुनः प्रहसन्निव |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
तानेवं व्रुवतः सर्वान्सत्यवान्वाक्यमव्रवीत् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
तानेवं व्रुवतो वीरान्सात्यकिर्निशितैः शरैः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
तानेवमुक्त्वा द्रुपदस्य पुत्रः; पश्चादिदं द्रौपदीमभ्युवाच |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
तानेवाग्नीन्परिचरेद्यजमानो दिवौकसः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
तानेवाग्नीन्यथाशास्त्रमर्चय़न्नतिथिप्रिय़ः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तानेवानुसरन्रम्यं ददर्श सुमहत्सरः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
तानेवाभिसमीक्ष्याहं सञ्जय़ त्वामचूचुदम् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
तानेवेन्द्रस्य हि धनुरनाम्यं नमतोऽव्रवीत् |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
तानेष रभसः क्रूरो वाक्षल्यानवधारय़न् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तानौदकान्पक्षिगणान्निरीक्ष्य भरतर्षभः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
तान्कर्णः प्रतिविव्याध षष्ट्या षष्ट्या महारथः |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
तान्कर्णस्त्वग्रतोऽभ्यस्तान्मोघांश्चक्रे महारथः |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
तान्कश्यप उवाचेदं सान्त्वपूर्वं प्रजापतिः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तान्कालनिर्मितान्वुद्ध्वा न सञ्ज्ञां हातुमर्हसि ||
१९० ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
तान्कृत्वा पतगश्रेष्ठः सर्वानुत्क्रान्तजीवितान् |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तान्केशवार्चिर्निर्दग्धान्न त्वं शोचितुमर्हसि ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तान्क्रतून्भरतश्रेष्ठ शतकृत्वो महाद्युतिः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
तान्क्षिप्तान्रेणुका सर्वांस्तस्येषून्दीप्ततेजसः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तान्गृहीतशरावापान्क्रुद्धानापततो नृपान् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
तान्गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
तान्दत्त्वा नोपहिंसेत न हरेन्नोपनाशय़ेत् ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तान्दर्शय़ामास तदा भगवान्हव्यवाहनः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्दानवान्दैवविमूढवुद्धी; निदं समाहूय़ वचोऽभ्युवाच ||
५६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तान्दीनमनसः सर्वान्निभृतान्गतचेतसः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
तान्दृष्ट्वा चलितान्सङ्ख्ये प्रणुन्नान्द्रोणसाय़कैः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
तान्दृष्ट्वा जाह्नवीपुत्रः प्रोवाच वचनं तदा |
५२ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
तान्दृष्ट्वा दशसाहस्रान्मय़ूरसदृशान्हय़ान् |
२३ क