chevron_left  तांश्चarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
तांश्च सन्त्यज्य भगवञ्श्मशाने रमसे कथम् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तांश्च सर्वाञ्शरैस्तीक्ष्णैर्जघान परमास्त्रवित् ||
२७ ग
सभा पर्व
अध्याय ६८
अर्जुन उवाच
तांश्च सर्वाञ्शितैर्वाणैर्नेतास्मि यमसादनम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
तांश्च सर्वानवामृद्नाद्रामः प्रहरतां वरः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
तांश्च सर्वान्दशिष्यामः कृतमेवं भविष्यति ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
तांश्च सर्वान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरताडय़त् ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तांश्च सर्वान्महेष्वासान्पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
श्रीभगवानु उवाच
तांश्च सर्वान्मय़ोद्दिष्टान्द्रक्ष्यसे तपसान्वितः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तांश्च सर्वान्रणे योधान्प्रेतराजपुरं प्रति |
७६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
तांश्च सर्वान्समानाय़्य राशीन्कृत्वा सहस्रशः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
तांश्च सर्वान्स्मय़ाविष्टो वीर्योन्मत्तः पुरन्दरः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
तांश्च सर्वान्हनिष्यामि सत्येनाय़ुधमालभे ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
तांश्चकर्त शरैः पार्थः सरोषान्दृश्य खेचरान् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
तांश्चानुसञ्चार्य ततः कृतार्थाः; पतन्ति विप्रेषु यतेषु भूय़ः ||
१०६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
तांश्चापि त्वं कृपणान्सर्वथैव; अस्मद्वाक्यात्कुशलं तात पृच्छेः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तांश्चापि दैवतश्रेष्ठः प्राह प्रीतो जगत्पतिः |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
तांश्चापि सर्वान्सम्प्रेक्ष्य पुत्रो दुःशासनस्तव |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
तांश्चालमिति मन्यन्ते सव्यसाचिवधे विभो |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तांश्चास्य गोप्तॄन्विव्याध त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २९
भीष्म उवाच
तांश्चेज्जय़ति शत्रून्स तदा प्राप्नोति सद्गतिम् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
तांश्चेल्लभेय़ं संविदं तेन कृत्वा; तथापि नेच्छेय़मिति प्रतीतः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
तांश्चैव प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाभवत् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
तांश्चैव सर्वान्पुत्रस्ते समचोदय़दग्रतः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
तांश्चैवानय़ भद्रं ते पानीय़ं च त्वमानय़ ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
तांस्तत्त्वविदनादृत्य स्वात्मनैव निवर्तय़ेत् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
तांस्तत्र जहि कौन्तेय़ गुर्वर्थस्ते भविष्यति ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तांस्तत्राधिरथिः सङ्ख्ये चेदिपाञ्चालपाण्डवान् |
६८ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तांस्तथा भज्यतस्त्रस्तान्कौरवान्भरतर्षभ |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तांस्तथा भृशसङ्क्रुद्धान्पाञ्चालान्मत्स्यकेकय़ान् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
तांस्तथा रूपवीर्यौजःसम्पन्नान्पौरसंमतान् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
तांस्तथा वादिनो राजन्पुत्रांस्तव धनञ्जय़ः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
तांस्तथा व्यथितान्दीनान्भिक्षमाणान्युधिष्ठिरम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
तांस्तथा व्याकुलीकृत्य त्वरमाणो धनञ्जय़ः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
तांस्तथा व्रुवतो दृष्ट्वा सौभद्रः प्रहसन्निव |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
तांस्तथा समुदीक्ष्याथ कौरवाणां महारथान् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
तांस्तथाङ्गेषु संसक्तानङ्गदो रजनीचरान् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तांस्तथाभिमुखान्वीरान्मित्रार्थे त्यक्तजीवितान् |
१०० क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
तांस्तथावादिनः पौरान्दुःखितान्दुःखकर्शितः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २४४
वैशम्पाय़न उवाच
तांस्तथेत्यव्रवीद्राजा सर्वभूतहिते रतः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
तांस्तथोत्पततः पार्थः शरैः सञ्छिद्य खण्डशः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तांस्तदापततो दृष्ट्वा सौवलस्य पदानुगान् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
तांस्तांस्तेष्वेव युय़ुजे प्रीय़माणो महीपतिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
तांस्तादृशानहं हत्वा धर्मनित्यान्महीक्षितः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तांस्तानन्यान्महेष्वासान्साश्वान्सरथकुञ्जरान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
तांस्तानुपासते धर्मान्धर्मकामा यथागमम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
तांस्तान्देशान्विचिन्वन्तौ दम्पती परिजग्मतुः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
तांस्तान्विकुरुते भावान्वहूनथ मुहुर्मुहुः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
तांस्तान्विगणय़न्नर्थानवस्थित इवाभवत् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तांस्तु कर्णः शरैस्तीक्ष्णैर्नाशय़िष्यत्यसंशय़म् ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
तांस्तु कामरसान्विद्याद्यत्र मज्जन्ति मानवाः ||
११ ख