chevron_left  तान्प्रविष्टांस्तदाarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रविष्टांस्तदा दृष्ट्वा इरावानपि वीर्यवान् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
तान्प्रश्नानव्रवीत्पार्थ मेधावी स धृतव्रतः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावनः |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रसह्य महावीर्यः पुनरेव व्यवस्थितान् |
३ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रस्थितानन्वगच्छद्वृषपर्वा महीपतिः ||
२४ ग
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय़ कृष्णद्वैपाय़नस्तदा |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रस्थितान्प्रीतमनाः स पार्थो; धनञ्जय़ः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीरान् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रस्थितान्प्रीतिमना महर्षिः; पितेव पुत्राननुशिष्य सर्वान् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तान्प्रहृष्टास्ततः सूता राजभक्तिपुरस्कृताः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
तान्प्राप्य तु स धिग्दण्डो नकारणमतोऽभवत् |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
तान्प्रेक्षमाणोऽपि व्यथां न चकार महावलः ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रेक्ष्य द्रवतः सर्वान्भीमसेनभय़ार्दितान् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रेक्ष्य भग्नान्विमुखीकृतांश्च; घटोत्कचो रोषमतीव चक्रे ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रेक्ष्य सहितान्सर्वाञ्जवेनोद्यतकार्मुकान् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
तान्प्रय़च्छस्व विप्रेभ्यो विधिदृष्टेन कर्मणा ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रय़ातान्महेष्वासानभिमन्युपुरोगमान् |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तान्प्रय़ातान्समालोक्य युधिष्ठिरपुरोगमाः |
६४ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तान्भिन्नकुम्भान्सुवहून्द्रवमाणानितस्ततः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
तान्भीतान्विगतज्ञानान्भीमः प्रहरतां वरः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तान्भीमसेनः सङ्क्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १७१
और्व उवाच
तान्भृगूणां तदा दारान्कश्चिन्नाभ्यवपद्यत |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
तान्महर्षिगणान्सर्वाञ्शिरोभिरभिवाद्य च |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
तान्मानय़ेत्पूजय़ेच्च नित्यं वाचा च कर्मणा |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
तान्मृतानपि क्रव्यादाः कृतघ्नान्नोपभुञ्जते ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
तान्यकार्याणि मे व्रह्मन्दहन्ति च तपन्ति च ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
तान्यगृह्णात्ततो राजन्रुचिर्नलिनलोचना |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्यग्नौ जुहुवुर्धीराः समस्ताः षोडशर्त्विजः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तान्यत्तान्रुक्मवर्णाभान्विनीताञ्शीघ्रगामिनः |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तान्यद्य जीवितं चास्य शमय़न्तु शरास्तव ||
८२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
तान्यनीकानि दृप्तानि शस्त्रवन्ति महान्ति च |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
तान्यनीकानि भग्नानि द्रवमाणानि भारत |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
तान्यनीकानि सौभद्रो द्रावय़न्वह्वशोभत |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तान्यनीकान्यथालोक्य राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् |
६५ क
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्यनीकान्यदृश्यन्त कुरूणामुग्रधन्विनाम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
तान्यनीकान्यनीकेषु समसज्जन्त भारत |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तान्यनीकान्यशोभन्त रथैरथ पदातिभिः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
तान्यन्तरिक्षे चिच्छेद पौत्रस्तव शितैः शरैः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
तान्यप्यस्मै प्रदास्यामि यावदर्हति केशवः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तान्यर्जुनः सहस्राणि दश पञ्चैव चाशुगैः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
तान्यर्जुनः सहस्राणि रथवारणवाजिनाम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
भीष्म उवाच
तान्यवुध्यत तेजस्वी स विप्रः संशितव्रतः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
तान्यस्त्रैरेव समरे प्रतिजघ्नेऽस्य पाण्डवः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्यहं कीर्तय़िष्यामि भक्त्या स्थैर्यार्थमात्मनः ||
७३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
तान्यहं तत्प्रतीघातैरस्त्रैरस्त्राणि भारत |
३ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तान्यहं नेतुमिच्छामि काम्यकं पुनराश्रमम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
तान्याप्नुहि त्वं कल्याणि सुखिनी शरदां शतम् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तान्यामुच्य शरीरेषु दंशितास्ते परन्तपाः ||
२४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
तान्युक्तैरुपजिज्ञास्य तथा द्विजवरोत्तमान् ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्युदीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यनेकशः |
१२ क