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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
तव शिष्यं महावाहो धनुष्यनवरं त्वय़ा ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तव शुश्रूषणे युक्ता वत्स्यामो हि तवाश्रमे |
५० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
तव शुश्रूषय़ा चैव गान्धार्याश्च यशस्विनी |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तव शुश्रूषय़ा राजन्राजपुत्र्या विनिर्जिताः ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
तव शोकेन वृद्धौ तावन्धौ जातौ तपस्विनौ |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
तव सङ्कीर्तय़िष्यामि ये च तस्य व्यतिक्रमाः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
नारद उवाच
तव सन्दर्शनादेव मुक्तोऽहं सर्वकिल्विषैः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
तव सन्धारय़न्पुत्रमव्रवीच्छन्तनोः सुतः ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
तव सर्वः सुविदितः स्त्रीधर्मः शाश्वतः शुभे |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
युधिष्ठिर उवाच
तव सर्वज्ञ सर्वं हि विदितं कुरुसत्तम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तव सानूनि कुञ्जाश्च नद्यः प्रस्रवणानि च |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
तव सेनां महाराज सव्यसाची व्यकम्पय़त् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
तव सेनां महावाहुः स्वां चैव परिपालय़न् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
तव सैन्यं महाराज निराशं कर्णजीविते ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
तव सैन्यं सञ्चुकोच चर्म वह्निगतं यथा ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
तव सैन्यं समासाद्य पीडय़ामासुरोजसा ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तव सैन्यस्य गोप्तासीद्भारद्वाजो रथर्षभः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तव सैन्येषु योधानां पार्थभूतमिवाभवत् ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तव सैन्येष्ववाद्यन्त वादित्राणि च भारत ||
६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
तव स्नेहात्पुराणर्षिर्वासुदेवश्चतुर्भुजः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
तव स्म किङ्कराः सर्वे सर्वे च वशगास्तव ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
तव स्याद्यदि सद्वृत्तं तेन मे त्वं प्रिय़ो भवेः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तव हत्वा वलं सर्वं सङ्ग्रामे धृतराष्ट्रजः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
तव ह्यनुमते भीष्म निय़तं स महातपाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
तव ह्यस्त्रवलं भीमं माय़ाश्च तव दुस्तराः |
४९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि मम चैव न संशय़ः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि लाघवं वलमेव च |
५३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
तव ह्याचरतो व्रह्मंस्तुष्टोऽहं वै न संशय़ः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
तव ह्याद्यस्य देवस्य क्षरस्यैवाक्षरस्य च |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तव ह्याश्रित्य तां देवीं वुद्धिं वुद्धिमतां वर |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वासुदेव उवाच
तव ह्युपस्थिता लोका येभ्यो नावर्तते पुनः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
तवाचार्यो रणं हित्वा गतः कापुरुषो यथा |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तवाज्ञां शिरसा गृह्य पाण्डवार्थमहं प्रभो |
९ क
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
तवाज्ञय़ा पार्थिव निर्विशङ्का; विहाय़ मानं विचरन्वनानि |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
तवातिसर्गाद्देवेश प्राजापत्यमिदं पदम् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तवात्मजं तस्य तवात्मजः शरैः; शितैः शरीरं विभिदे द्विपं च तम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तवात्मजं पुरस्कृत्य सूतपुत्रस्य पृष्ठतः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तवात्मजः सूतसुतश्च न व्यथां; न विस्मय़ं जग्मतुरेकनिश्चय़ौ ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तवात्मजस्याथ वृकोदरस्त्वर; न्धनुः क्षुराभ्यां ध्वजमेव चाच्छिनत् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तवात्मजा वृष्णिपुरं प्रविश्य; न दैवतेभ्यः स्पृहय़न्ति कृष्णे ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
तवात्मजांस्तु पतितान्दृष्ट्वा कर्णः प्रतापवान् |
१ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तवात्मजानां च तथाभिमन्योः; पराक्रमैस्तुष्यति रौक्मिणेय़ः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
तवात्मजोऽय़ं मर्त्येषु कुलशीलदमादिभिः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
तवाद्य देहरक्षार्थं मन्त्रेण नृपसत्तम ||
६७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तवाद्य पृथिवी राजन्क्षेमा निहतकण्टका |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
तवाद्य पृथिवी राजन्निखिला सागराम्वरा |
८ क
वन पर्व
अध्याय २४१
कर्ण उवाच
तवाद्य पृथिवी वीर निःसपत्ना नृपोत्तम |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
तवाद्य पृथिवीपाला वश्याः सर्वे नृपोत्तम ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
तवाध्वना ग्लानिमिवोपलक्षय़े; निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
तवानुकम्पय़ा साधो साधु गच्छाम माचिरम् ||
३६ ख