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वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
तान्समापततो राजन्गन्धर्वाञ्शतशो रणे |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
तान्समाश्वास्य तु तदा मद्रराजः प्रतापवान् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
तान्समीक्ष्य गतानक्षानात्मानं च विवाससम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
तान्समीक्ष्य ततः सर्वान्निर्विशेषाकृतीन्स्थितान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तान्समीक्ष्य तु कौन्तेय़ो भीमसेनः पराक्रमी |
७२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तान्समीक्ष्य स कौन्तेय़ः सर्वान्वन्धूनवस्थितान् ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्समीपगताञ्श्रुत्वा निर्ययुर्वृष्णिपुङ्गवाः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
तान्समीपगताञ्श्रुत्वा पाण्डवाञ्शत्रुकर्शनः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तान्समीपगतान्दृष्ट्वा जवेनोद्यतकार्मुकान् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तान्समेतान्रणे शूरांश्चेदिपाञ्चालसृञ्जय़ान् |
६८ क
वन पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
तान्समेत्य स राजर्षिरभिवाद्य कृताञ्जलिः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वानग्रहारेण व्राह्मणान्व्रह्मवादिनः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
तान्सर्वाननुगृह्णीय़ाद्भवेच्चानपगो गुरोः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
तान्सर्वाननुपश्य त्वं समाश्रित्यैव गालव ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वाननुवर्तामि दिवारात्रमतन्द्रिता |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तान्सर्वानाहवे क्रुद्धान्सानुवन्धान्समागतान् |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वानुत्सुकान्दृष्ट्वा पाण्डवान्दीनचेतसः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
तान्सर्वान्गुणसम्पन्नानमनुष्यप्रतापिनः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वान्धर्मराजस्य प्रेम्णा राजाम्विकासुतः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
तान्सर्वान्धार्मिको राजा वलिं विष्टिं च कारय़ेत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तान्सर्वान्नृपतेः पुत्रानदहत्स्वेन तेजसा ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तान्सर्वान्पतितान्दृष्ट्वा भीतो दुर्योधनस्ततः |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
तान्सर्वान्प्रसभं दृष्ट्वा वलिनौ जघ्नतुस्तदा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
तान्सर्वान्प्रेषय़ामास परलोकाय़ भारत ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
तान्सर्वान्विमुखांश्चक्रे कांश्चिन्निन्ये यमक्षय़म् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वान्व्यादिदेशास्मै सर्वभूतपितामहः ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वान्स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डवः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वान्स समागम्य विधिवत्कुरुनन्दनः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
तान्सर्वान्सम्प्रपश्यामि वरदानात्तवाच्युत ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
तान्सर्वान्सहिताञ्शूरान्यतमानान्महारथान् |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
तान्ससूतरथान्सर्वान्सपताकाध्वजाय़ुधान् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सिंहविक्रान्तगतीनवेक्ष्य; महर्षभाक्षानजिनोत्तरीय़ान् |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सुपर्णाश्च गृध्राश्च निष्कर्षन्त्यसृगुक्षितान् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तान्सूतपुत्रो विशिखैर्दशभिर्दशभिः शितैः |
७३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
तान्सूदय़ित्वाहमपास्य कर्णं; द्रष्टुं भवन्तं त्वरय़ाभिय़ातः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तान्सेवेत्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीय़सी ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
तान्सोमः प्रत्युवाचाथ श्रेय़श्चेदीप्सितं सुराः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तान्सोऽभिपत्य जिज्ञासुः क एषां श्रेष्ठभागिति |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
तान्स्वस्तिवाक्येनाभ्यर्च्य समुत्थाप्य च शङ्करः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
तान्स्वय़ं वै परित्रास्ये रक्षन्ती जीवितं पितुः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तान्हत्वा निशितैर्वाणैः सामात्यान्सह वन्धुभिः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
तान्हत्वा भुङ्क्ष्व धर्मेण युधिष्ठिर महीमिमाम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तान्हृष्टान्पुरुषव्याघ्रान्पाञ्चालान्पाण्डवैः सह |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तान्हय़ान्निहतान्दृष्ट्वा द्विजाग्र्येण स पार्षतः |
१४४ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
अर्जुन उवाच
तापत्य इति यद्वाक्यमुक्तवानसि मामिह |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
तापत्यमथ वासिष्ठमौर्वं चाख्यानमुत्तमम् |
८७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तापनं सर्वसैन्यानां घोररूपं सुदारुणम् |
१०२ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
तापनीय़ा सुरुचिरा ध्वजय़ष्टिरनुत्तमा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तापसानां च शान्तानां भवेदुद्वेगकारकः ||
३२ ख