वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरमाणोऽभिनिर्यातु चिरमर्थोपपादकम् ||
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणोऽभ्यतिक्रान्तो ध्रुवं तस्यैष निस्वनः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
त्वरमाणोऽव्ययात्कर्णं भीमं चावारय़च्छरैः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
त्वरस्व तूर्णमागच्छ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
त्वरस्व प्राग्वधाय़ैव त्वय़ि भारः समाहितः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
अर्जुन उवाच
त्वरस्व भीम मा क्रीड जहि रक्षो विभीषणम् |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
त्वरावानद्य यात्वाहं समुच्छ्रितमहाध्वजम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
त्वराय़ुक्तो महावाहुस्तत्सैन्यं समुपाद्रवत् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
त्वराय़ुक्तौ महाराज प्रार्थय़ानौ महद्यशः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
त्वरितं त्वरणीय़ेषु धनञ्जय़हितैषिणम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरितं देवय़ान्याथ प्रेषितं पितुरात्मनः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरितं सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
त्वरितं सिंहसेनस्तु द्रोणं विद्ध्वा महारथम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
त्वरितः काम्यके पार्थान्समभावय़दच्युतः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
त्वरितः प्रय़यौ तत्र सहामात्यपुरोहितः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
त्वरितमतिरथा रथर्षभं; द्विरदरथाश्वपदातिभिः सह ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
त्वरितश्चन्द्रदेवं च शरैर्निन्ये यमक्षय़म् ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
त्वरितस्त्वरमाणाभ्यां भ्रातृभ्यां भारतो वली ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
त्वरिता जवनैरश्वैराय़ोधनमुपागमन् ||
२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
त्वरिता लोकवीरेण प्रहताः सव्यसाचिना ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
त्वरिताः कुरुत श्रेय़ो नैतदेतावता कृतम् |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
त्वरिताः क्षत्रिय़ा राजञ्जग्मुर्द्वैपाय़नं ह्रदम् ||
४७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरिताः पुरुषा राजन्नुपाजह्रुः सहस्रशः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
त्वरिताः समुपाजग्मुर्दमय़न्तीमभीप्सवः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरिताः सहिता राजन्ननुजग्मुः शतक्रतुम् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
त्वरितो भरतश्रेष्ठ तत्राय़ाद्विकिरञ्शरान् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
त्वरितो रथमभ्येत्य सौहृदादिव भारत ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्वरितोऽभिपतत्यस्मांस्त्यक्त्वा सैन्यान्यसंशय़म् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
त्वरितोऽभ्यद्रवद्द्रोणं महेन्द्र इव शम्वरम् ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
अश्वत्थामो उवाच
त्वरे चाहमनेनाद्य यदिदं मे चिकीर्षितम् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
त्वरय़न्तोऽर्जुनं युद्धे हृष्टरूपा ववाशिरे ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरय़न्पुरुषव्याघ्रो जरासन्धवधेप्सय़ा ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
त्वरय़ा चोपसङ्गम्य स्नेहादागतसम्भ्रमः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरय़ा निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वरय़ा परय़ा युक्तस्तपसे धृतनिश्चय़ः |
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
त्वरय़ा परय़ा युक्ताः प्राद्रवन्त विशां पते ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
त्वरय़ा परय़ा युक्तो दर्शय़न्नस्त्रलाघवम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
त्वरय़ा वासुदेवश्च धर्मराजश्च मारिष |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
त्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य; प्रहृष्टरूपः प्रय़तः प्रय़त्नात् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
त्वष्टा प्रजापतिः श्रुत्वा शक्रेणाथ हतं सुतम् |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
त्वष्टा प्रजापतिर्ह्यासीद्देवश्रेष्ठो महातपाः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
त्वष्टाधिराजो रूपाणां पशूनामीश्वरः शिवः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वष्टावरस्तथात्रिश्च द्वावन्यौ मन्त्रकर्मिणौ |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
त्वष्टुः सुदुर्धरं तेजो येन वृत्रो विनिर्मितः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वष्टुर्देवस्य तनय़ो वलवान्विश्वकर्मणः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
त्वष्टुश्चैवात्मजः श्रीमान्विश्वरूपो महाय़शाः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
त्वष्टुस्तपोवलाद्विद्वांस्तदा शक्रो न्यवर्तत ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
महेश्वर उवाच
त्वष्टुस्तेजोभवा घोरा दुर्निवार्याकृतात्मभिः ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
त्वष्ट्रा कृतं वाहमकूजनाक्षं; शुभं समास्थाय़ कपिध्वजं त्वम् |
१३ क