chevron_left  तामर्जुनस्तदाय़ान्तींarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
तामर्जुनस्तदाय़ान्तीं शक्तिं हेमविभूषिताम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपय़ोधराम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
तामर्हणां नलो राजा प्रतिगृह्य यथाविधि |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
तामवप्लुत्य जग्राह कर्णो न्यस्य रथे धनुः |
९१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तामवप्लुत्य जग्राह द्रौणिर्न्यस्य रथे धनुः |
१०४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तामवप्लुत्य जग्राह सकोशं चाकरोदसिम् |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तामवस्थामवेक्ष्यान्त्यां साम्नैव प्रत्यपूजय़त् ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तामवासृजदाविध्य क्रुद्धः कर्णरथं प्रति ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तामवुध्यदमेय़ात्मा वलवान्सत्यविक्रमः |
८८ क
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
तामवेक्ष्य ततः क्रुद्धः समपध्याय़त द्विजः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
तामवेक्ष्य तु कौन्तेय़ो विवर्णवदनां कृशाम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
तामव्रवीच्छाल्वपतिः स्मय़न्निव विशां पते |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तामव्रवीत्कौरवेय़ मम माता जलोत्थिता |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
तामव्रवीत्ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
तामव्रवीत्ततो राजा कन्यां मधुरभाषिणीम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तामव्रवीत्ततो विप्रो राजपुत्रीं सुदर्शनाम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
तामव्रवीत्तदा देवो मृत्यो संहर मानवान् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तामव्रवीद्धसन्देवो भविता वै सुतस्तव |
६७ क
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
तामव्रवीद्राजपुत्री विराटवचनादिदम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
तामश्मवृष्टिं तुमुलां पार्वतीय़ैः समीरिताम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा वहु |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
तामसं युगमासाद्य कृष्णो भवति केशवः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
तामसस्याधमं स्थानं प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
तामसा निरय़ं यान्ति राजसा मानुषांस्तथा |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
तामसा राक्षसाश्चेति तस्माद्दीपः प्रदीय़ते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
तामसानां च जन्तूनां रमणीय़ावृतात्मनाम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
तामसानां तु सङ्घातं प्रवक्ष्याम्युपधार्यताम् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तामस्त्रवृष्टिं प्रहितां द्विपस्थैर्यवनैः स्मय़न् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
तामस्य लघुतां द्रोणः समवेक्ष्य विशां पते |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
तामस्य वाचं देवाश्च ऋषय़श्च महात्मनः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तामस्य विशिखैश्छित्त्वा त्रिधा त्रिभिरपातय़त् |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तामस्य विशिखैस्तीक्ष्णैः क्षिप्यमाणां महारथः |
१३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तामस्य विशिखैस्तूर्णं पातय़ामास भारत |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
तामस्वस्थां तदाकारां सख्यस्ता जज्ञुरिङ्गितैः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
तामहं न हनिष्यामि प्राणत्यागेऽपि भारत |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
तामहं प्राञ्जलिर्भूत्वा पुनरेव व्यसर्जय़म् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
शौनक उवाच
तामहं विधिवत्पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वै कथाम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
ऋषभ उवाच
तामहं व्यपनेष्यामि इति कृत्वा व्यवस्थितः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तामाजुहावौघवतीं क्वासि यातेति चासकृत् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
तामादाय़ प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदय़न् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
तामादाय़ापनेष्यामि ततः स न भविष्यति |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
तामादाय़ार्जुनस्तूर्णं द्रौपदीं गजराडिव |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तामाधिरथिराय़स्तः शक्तिं हेमपरिष्कृताम् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
तामापतन्तीं चिच्छेद मध्ये वज्रेण वासवः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
तामापतन्तीं चिच्छेद शिखण्डी वहुभिः शरैः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तामापतन्तीं जग्राह चित्रो राजन्महामनाः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
तामापतन्तीं दृष्ट्वैव गदां रोहिणिनन्दनः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
तामापतन्तीं विमलामश्मगर्भां महागदाम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
तामापतन्तीं वेगेन गदां ज्वालाकुलां ततः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तामापतन्तीं समरे शरवृष्टिं सुदारुणाम् |
३१ क