वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तारां परुषमुक्त्वा स निर्जगाम गुहामुखात् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
ताराक्षः कमलाक्षश्च विद्युन्माली च पार्थिव ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
ताराढ्यं कुमुदाकारमाकाशं निर्मलं च ह |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
ताराणां पतनं दृष्ट्वा नक्षत्राणां च पर्ययम् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
ताराणामिव सम्पातो वभूव जनमेजय़ |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
ताराधिपं वै विमलं सतारं; विश्वांश्च देवानुरगान्पितॄंश्च |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तारापतिमिवापूर्णमन्तकाले यदृच्छय़ा ||
६९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
तारामृगमिवाकाशे देवदेवः पिनाकधृक् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
तारारूपाणि दृश्यन्ते यान्येतानि नभस्तले |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तारारूपाणि यानीह दृश्यन्ते द्युतिमन्ति वै |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
तारारूपाणि सर्वाणि यच्चैतच्चन्द्रमण्डलम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
तारासहस्रखचितं सिंहध्वजपताकिनम् ||
७८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तारोद्भासस्य नभसः शारदस्य समत्विषम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
मार्कण्डेय़ उवाच
तार्क्ष्यं विप्रं धर्मय़ुक्तं हितं च; सरस्वती वाक्यमिदं वभाषे ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तार्क्ष्यमारुतरंहोभिर्वाजिभिः साधुवाहिभिः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्चासितध्वजः |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च तथैव गरुडारुणौ |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तारय़ामास तांस्तीर्णाञ्ज्ञात्वा दुर्योधनो नृपः |
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तारय़िष्यति वः सर्वान्सावित्रीव कुलाङ्गना ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
तारय़ेत कुलं कृत्स्नमेकोऽपीह द्विजर्षभः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
तारय़ेत कुलं कृत्स्नमेकोऽपीह द्विजोत्तमः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
तारय़ेद्वृक्षरोपी च तस्माद्वृक्षान्प्ररोपय़ेत् ||
२६ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तालः सुपर्णश्च महाध्वजौ तौ; सुपूजितौ रामजनार्दनाभ्याम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
तालजङ्घं महत्क्षत्रमौर्वेणैकेन नाशितम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तालमात्रं धनुर्गृह्य शङ्खमभ्यद्रवद्रणे ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथाः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महारथाः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
तालमात्राणि चापानि विकर्षन्तो महावलाः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तालवृन्तान्युपादाय़ पर्यवीजन्समन्ततः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तालुदेशमथोद्दाल्य व्राह्मणस्य महात्मनः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तालेन महता भीष्मः पञ्चतारेण केतुना |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तालेभ्य इव पक्वानि फलानि कुशलो नरः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
तालैरिव महीपाल वृन्ताद्भ्रष्टैरदृश्यत ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तावकं च वलं दृष्ट्वा भीमसेनात्पराङ्मुखम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तावकं तद्वलं राजन्नर्जुनोऽस्त्रविदां वरः |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तावका दृश्य मुक्तौ तौ विक्रोशन्ति स्म सर्वतः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
तावका निहते द्रोणे गतासव इवाभवन् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
तावका रथिनस्तत्र दृष्ट्वा कृष्णधनञ्जय़ौ |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
तावका रथिनो राजन्वारय़ामासुरोजसा ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
तावकांस्तव पुत्रांश्च योधय़न्ति स्म हृष्टवत् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तावकांस्तव पुत्रांश्च सहितान्सर्वराजभिः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तावकाः पाण्डवाश्चैव नाभ्यवर्तन्त भारत ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
तावकाः पाण्डवेय़ाश्च प्राध्याय़न्त पृथक्पृथक् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तावकाः पाण्डवेय़ाश्च संरव्धास्तात धन्विनः ||
८५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तावकाः पाण्डवैः सार्धं काङ्क्षमाणा जय़ं युधि ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तावकाः प्रद्रुता राजन्दुर्योधनमृते नृपम् ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तावकाः समरे राजन्रक्षिता दृढधन्वना |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
तावकाः समवर्तन्त पाण्डवानामनीकिनीम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
तावकाः सैनिकाश्चापि मेनिरे निहतं नृपम् |
५७ क