उद्योग पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तथोपविष्टेषु महारथेषु; विभ्राजमानाम्वरभूषणेषु |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
तथोपाध्याय़शुश्रूषा व्रह्माश्रमपदं भवेत् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तथोभौ च यमौ युद्धे यमतुल्यपराक्रमौ |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
तथ्यं चेद्भवति ह्येतत्कन्या राजञ्शिखण्डिनी |
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
तथ्यं पथ्यं हितं चोक्तो न च गृह्णाति दुर्मतिः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
तथ्यं भवन्तो व्रुवते करिष्यामि च तत्तथा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
तथ्यं वदस्व मे व्रह्मन्नुपसन्नोऽस्म्यधीहि भोः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
तथ्यं वा काञ्चनष्ठीवीत्येतदिच्छामि वेदितुम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
तथ्यं वा यदि वातथ्यं यन्मय़ैतत्प्रभाषितम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
तथ्यं शुभं चैतदुक्तं त्वय़ा भोः; सम्यक्क्षेम्यं देवताद्यं यथावत् |
८० क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
तथ्यमर्थ्यं च पथ्यं च तस्य ते जगृहुस्तदा ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तथ्यमित्यवगम्यैनं प्राञ्जलिः प्रत्यपूजय़त् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
तथ्यान्वाप्यथ वातथ्यान्गुणानाहुः समागताः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तदक्षय़मिति प्राहुरृषय़ः संशितव्रताः ||
११८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
तदग्निहोत्रं ता गावो यज्ञाङ्गानि च सर्वशः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
तदग्ने त्वं महत्तेजः स्वप्रभावाद्विनिर्गतम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
तदग्रे राजधर्माणामर्थतत्त्वं पितामह |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
मतङ्ग उवाच
तदग्र्यं प्रार्थय़ानस्त्वमचिराद्विनशिष्यसि ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
तदङ्गं पुरुषेन्द्रस्य भ्रष्टवर्म व्यरोचत |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तदङ्गपतिना गुप्तं कृपेण च महात्मना |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तदज्ञानकृतं मत्वा व्राह्मणाय़ न्यवेदय़त् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
तदतथ्यभय़े मग्नो जय़े सक्तो युधिष्ठिरः |
११५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
तदतिक्रम्य भवनं त्वय़ा यातव्यमेव हि ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
तदतिरुचिरभीममावभौ; पुरुषवराश्वरथद्विपाकुलम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
तदतीत्य महादुर्गं प्रविष्टोऽस्मि महद्वनम् ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तदत्यद्भुतमालोक्य भूतं लोकभय़ङ्करम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
तदत्र पुण्डरीकाक्ष विधत्स्व यदभीप्सितम् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तदत्रिर्न्याय़तः सर्वं प्रतिगृह्य महामनाः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतं तदा दृष्ट्वा तत्र राजा स शन्तनुः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतं तय़ोर्युद्धं भूतसङ्घा ह्यपूजय़न् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतं देवमनुष्यसाक्षिकं; समीक्ष्य भूतानि विसिष्मिय़ुर्नृप |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतं प्राणभृतां भय़ङ्करं; निशम्य युद्धं कुरुवीरमुख्ययोः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
तदद्भुतं प्रेक्ष्य वज्री तदानी; मपृच्छत्तां योषितमन्तिकाद्वै |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतं महद्दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतं महारौद्रं विन्ध्यमन्दरसंनिभम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतं सर्वमनुष्ययोधाः; पश्यन्ति राजन्निहते स्म कर्णे ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुततमं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रो निराय़ुधः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
तदद्भुततमं दृष्ट्वा नलो राजाथ भारत |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
तदद्भुततमं दृष्ट्वा विस्मिताहमिहागता ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुततमं लोके वीक्ष्य सर्वमहीक्षिताम् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुततमं श्रुत्वा लोके तस्य महात्मनः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा मुनिगणस्तदा |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तदद्भुतमचिन्त्यं च सुमहद्रोमहर्षणम् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतमपश्याम तावकानां परैः सह |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतमपश्याम द्रोणस्य भुजय़ोर्वलम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतमपश्याम द्रोणस्याचार्यकं युधि |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतमपश्याम भगदत्तस्य संय़ुगे |
२७ क