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वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
तिस्रो वै गतय़ो राजन्परिदृष्टाः स्वकर्मभिः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
तिस्रोऽन्याः समवर्तन्त वाहिन्यो भरतर्षभ ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
तिस्रोऽप्येकेन वाणेन देवाप्याय़िततेजसा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
तीक्ष्णकाले च तीक्ष्णः स्यान्मृदुकाले मृदुर्भवेत् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
तीक्ष्णता मृदुता मृत्युरागमानागमौ तथा |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
तीक्ष्णतापश्च हर्यश्वः सहाय़ः कर्मकालवित् ||
५३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
तीक्ष्णदंष्ट्राय़ तीक्ष्णाय़ वैश्वानरमुखाय़ च |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
तीक्ष्णधारेषुदशनः शितनाराचदंष्ट्रवान् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
तीक्ष्णवीर्यास्तु भूतानां दुरालम्भाः सकण्टकाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
तीक्ष्णा वय़मिति ख्याता भवतो ज्ञापय़ामहे |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
तीक्ष्णां तनुं यः प्रथमं जहाति; सोऽनन्तमाप्नोत्यभय़ं प्रजाभ्यः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
तीक्ष्णांशोर्भास्करस्यांशः कर्णोऽरिगणसूदनः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
तीक्ष्णाङ्कुशशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैश्च शोभितम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
तीक्ष्णाच्चोद्विजते लोकस्तस्मादुभय़माचर ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
तीक्ष्णैः शस्त्रैः सुविक्लिष्टः क्षत्रिय़ो मृत्युमर्हति ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तीक्ष्णैरग्निशिखाप्रख्यैर्नाराचैर्दशभिर्हतः ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तीरग्राहास्तरतोय़ा राजिका रस्यकागणाः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ११३
लोमश उवाच
तीरादुपादाय़ तथैव चक्रे; राजाश्रमं नाम वनं विचित्रम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
तीर्णं तत्पाण्डवै राजन्यत्पुरा नाववुध्यसे ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तीर्णः संशप्तकान्हत्वा प्रत्यदृश्यत फल्गुनः ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
धृतराष्ट्र उवाच
तीर्णः सैन्यार्णवं वीरः प्रतिश्रुत्य युधिष्ठिरे ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
तीर्णप्रतिज्ञं वीभत्सुं परिष्वज्येदमव्रवीत् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
तीर्णाः स्म दुस्तरं तात द्रोणानीकमहार्णवम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
तीर्णो गच्छेत्परं पारं नावमुत्सृज्य निर्ममः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
तीर्त्वा च दुस्तरं जन्म विशन्ति विमलं नभः ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
तीर्त्वा नदान्नदीश्चैव पल्वलानि वनानि च |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्त्वा समुद्रं वणिजः समृद्धाः; सन्नाः कुनद्यामिव हेलमानाः |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ अनाजन्मेति विश्रुतम् ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
८८ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ सर्वलोकेषु विश्रुतम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं चात्र परं पुण्यं वसूनां भरतर्षभ |
९४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं तत्र महाराज महदन्यत्र दुर्लभम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं तत्र महाराज श्वानलोमापहं स्मृतम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं पुण्यतमं राजन्पावनं लोकविश्रुतम् ||
१६३ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तीर्थं भोगवती चैव वेदी प्रोक्ता प्रजापतेः ||
७२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थलोभान्नरव्याघ्र नद्यास्तीरं समाश्रिताः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
तीर्थवंशश्च वंशश्च नक्षत्राणां युधिष्ठिर |
८१ क
वन पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थशैलवरेभ्यश्च समेतेभ्यो दृढव्रतः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
तीर्थशौचमनर्थित्वमार्दवं सत्यमार्जवम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
तीर्थानां गुरवस्तीर्थं शुचीनां हृदय़ं शुचि |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानां दर्शनं चैव पर्वतानां च भारत |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
तीर्थानां दर्शनं श्रेय़ः स्नानं च भरतर्षभ |
१ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानां पृथिवीपाल व्रतानां च विशां पते ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानां विस्तरं राजन्गुणोत्पत्तिं च सर्वशः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
तीर्थानां हृदय़ं तीर्थं शुचीनां हृदय़ं शुचिः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानि च सुपुण्यानि मय़ा दृष्टान्यनेकशः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
तीर्थानि चाभिगत्वा वै दानानि विविधानि च ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
तीर्थानि चैव रम्याणि वनानि च सरांसि च |
६ क
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
तीर्थानि देवा विविशुर्नाविशन्भारतासुराः |
७ क