उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
तित्तिरिर्हस्तिभद्रश्च कुमुदो माल्यपिण्डकः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तिथावथ च नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तिथावथ मुहूर्ते च नक्षत्रे च तथा शिवे ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
तिथिं पक्षस्य न व्रूय़ात्तथास्याय़ुर्न रिष्यते ||
६२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
तिथीनां निय़मा ये तु शृणु तानपि पार्थिव ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे मुहूर्ते चाभिपूजिते ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तिमिङ्गिलं च नृपतिं वशे चक्रे महामतिः ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
तिमिङ्गिलझषाकीर्णं मकरैरावृतं तथा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
तिमिङ्गिलाः कच्छपाश्च तथा तिमितिमिङ्गिलाः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तिमिनक्रझषावासं चिन्तय़न्तः सुदुःखिताः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
तिमिरघ्नश्च सविता दस्युहा चैव नो भव ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
तिमिरेणाकुलं सर्वमाकाशं चाभवद्वृतम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
तिमेरास्यमनुप्राप्ता यथा मत्स्या महार्णवे ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तिर्यक्च पततां दुःखं पततां नरके च यत् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
तिर्यक्प्रेक्षी संहतभ्रूः कथं शाम्येद्वृकोदरः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
तिर्यक्प्रेक्षी संहतभ्रूर्महात्मा; सिंहस्कन्धो यश्च सदात्यमर्षी ||
२३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तिर्यक्सरोषय़ा दृष्ट्या वीक्षां चक्रे स मन्युमान् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
तिर्यक्स्रोतस्त्वधःस्रोत उत्पद्यति नराधिप |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
तिर्यगीक्षः शुष्कमुखः पापको भ्रुकुटीमुखः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
तिर्यगेवानुपश्येत कर्मभिस्तामसैर्वृतः ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
तिर्यग्गच्छन्ति नरकं मानुष्यं दैवमेव च |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
युधिष्ठिर उवाच
तिर्यग्गतेश्च निर्मुक्तो निरय़ाच्च पितामह ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तिर्यग्यातेन नागेन समदेनाशुगामिना ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
तिर्यग्योनावसम्भाव्यमानृशंस्यं समास्थितः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
तिर्यग्योनिं न गच्छेत रूपवांश्च भवेन्नरः |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
युधिष्ठिर उवाच
तिर्यग्योनिगतं रूपं कथं धारितवान्हरिः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वृहन्नडो उवाच
तिर्यग्योनिगता वाले न चैनामववुध्यसे ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तिर्यग्योनिगतानां च विज्ञाय़ गतय़ः पृथक् ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
तिर्यग्योनिमनुप्राप्तं न तु मामजहात्स्मृतिः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
तिर्यग्योनिवधं कृत्वा द्रुमांश्छित्त्वेतरान्वहून् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
तिर्यग्योनिष्वपि सतां स्नेहं पश्यत यादृशम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
तिर्यग्योनिसहस्रेषु कदाचिद्देवतास्वपि |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
तिर्यग्योनिस्तथा तात विशेषश्चात्र वक्ष्यते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
तिर्यग्योनौ मनुष्यत्वे देवलोके तथैव च |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
तिर्यग्योनौ मनुष्यत्वे देवलोके तथैव च ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
तिर्यग्योनौ स्म जातेन मम चाप्यर्चनात्तथा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
तिर्यग्योन्यश्च ये चान्ये जीवलोकचराः स्मृताः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
तिर्यग्योन्यां पृथग्भावो मनुष्यत्वे विधीय़ते |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
तिर्यग्योन्याः शूद्रतामभ्युपैति; शूद्रो वैश्यत्वं क्षत्रिय़त्वं च वैश्यः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तिर्यग्विद्वांश्छिद्यमानान्क्षुरप्रै; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
तिलं तिलं समानीय़ रत्नानां यद्विनिर्मिता |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
तिलं तिलं समुद्धृत्य रत्नानां निर्मिता शुभा ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तिलकाः पारसीकाश्च मधुमन्तः प्रकुत्सकाः ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
तिलदानेन वै तस्मात्पितृपक्षः प्रमोदते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
तिलपिष्टं न चाश्नीय़ात्तथाय़ुर्विन्दते महत् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
तिलपीडैरिवाक्रम्य भोगैरज्ञानसम्भवैः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तिलशश्चिच्छिदुः क्रोधाच्छस्त्रैर्नानाविधैर्युधि ||
७ ख