भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
तुल्यपाणिशिरोग्रीवस्तुल्यवुद्धीन्द्रिय़ात्मकः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
तुल्यप्रिय़ाप्रिय़ो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
तुल्यमेतेन देवेन तं जानीह्यर्जुनं सदा ||
८० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तुल्यरूपगुणोपेतं समवेषं तथैव च |
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तुल्यरूपगुणोपेताः समेषु विषमेषु च ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
तुल्यरूपधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्धनाः ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
तुल्यरूपप्रभावाणां विदुषां युद्धशालिनाम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तुल्यरूपा गजाः पेतुर्गिर्यग्राम्वुदवेश्मनाम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
तुल्यरूपा विशिष्टाश्च क्षेप्स्यन्ति भरतर्षभ ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
तुल्यरूपाननान्मत्स्यांस्तिमिमत्स्यांस्तिमिङ्गिलान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
तुल्यवाहुवलानां च गुणैरपि निषेविनाम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
तुल्यशीलवय़ोय़ुक्तां तुल्याभिजनसंय़ुताम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
तुल्यशुक्रास्थिमज्जश्च तुल्यमांसासृगेव च |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तुल्यस्नेहोऽस्म्यतो भीमे तथा दुर्योधने नृपे ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तुल्यस्यैकस्य यस्याय़ं लोको वचसि तिष्ठति ||
१३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
तुल्या गङ्गा संमता व्राह्मणानां; गुहस्य व्रह्मण्यतय़ा च नित्यम् ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
तुल्या हि सर्वभूतानामिय़ं वैश्रवणस्य च |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
तुल्यादिह वधः श्रेय़ान्विशिष्टाच्चेति निश्चय़ः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
तुल्याभिजनकर्माणं शत्रुमेकं सहाय़वान् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
तुल्याभिजनवीर्यश्च कथं भ्रातुः श्रिय़ं नृप |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तुल्यारिमित्रतां प्राप्तः सुग्रीवेण धनुर्धरः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
तुल्यावेतौ सुतौ कस्य तन्मे व्रूहि पितामह ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तुल्याश्चैभिर्वय़सा विक्रमेण; जवेन चैवाप्रतिरूपाः सदश्वाः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
तुल्याश्मकाञ्चनो यश्च स कृतार्थो न पार्थिवः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
तुल्ये प्रिय़ाप्रिय़े यस्य सुखदुःखे तथैव च |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नागभार्यो उवाच
तुल्ये ह्यभिजने जातो न कश्चित्पर्युपासते ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान् |
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तुल्यो महात्मा तव कुन्ति पुत्रो; जातोऽदितेर्विष्णुरिवारिहन्ता |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस्तं निवोध युधां वर ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
तुल्यो यज्ञफलैरेतैस्तन्मे व्रूहि पितामह ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
तुल्यो हि प्रणय़स्तेषां प्रद्युम्नस्य च भामिनि ||
१४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
तुलय़ाधारय़द्धर्मो ह्यतिमानोऽतिरिच्यते ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
लोमश उवाच
तुलय़ामास कौन्तेय़ कपोतेन सहाभिभो ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
तुषभक्षं तु मां ज्ञात्वा प्रविविक्तजने गृहे |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तुषारगिरिकूटाभं सिताभ्रशिखरोपमम् ||
१०९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
तुषारा यवनाश्चैव शकाश्च सह चूचुपैः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
तुष्टः कस्मैचिदेवाहं न मिथ्या वाग्भवेन्मम ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
तुष्टः पितामहस्तेऽद्य तथा देवाः सवासवाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
ऋषय़ ऊचुः
तुष्टः प्रय़च्छति तथा सर्वान्दाय़ान्सुरेश्वरः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
तुष्टपुष्टजनः श्रीमान्सत्यवाग्दृढविक्रमः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
तुष्टपुष्टजना नित्यं नारी धर्मेण युज्यते ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
तुष्टपुष्टजनाकीर्णा सा पुरी कुरुनन्दन |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तुष्टपुष्टजनोपेतं चातुर्वर्ण्यजनाकुलम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
तुष्टपुष्टजनोपेतं वीरलक्षणलक्षितम् |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
तुष्टपुष्टवलः शत्रुरात्मवानिति च स्मरेत् ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
तुष्टपुष्टवलो याय़ाद्राजा वृद्ध्युदय़े रतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तुष्टश्च तुष्ट्या परय़ाभिनन्द्य; प्रदक्षिणं मम कृत्वा महात्मा ||
८१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
तुष्टा द्विजर्षभाश्चात्र दानैर्वहुविधैरपि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
तुष्टाव च महाय़ोगी देवं तत्रस्थ एव च |
२८ क