द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तृणवन्न्यस्य कौरव्यानेष आय़ाति सात्यकिः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
तृणाग्रेणापि संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
तृणानां मुष्टिनैकेन हिमवन्तं तु पर्वतम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तृणीकृत्य च यत्पार्थांस्तव पुत्रो ववल्ग ह |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
तृणोल्कय़ा ज्ञाय़ते जातरूपं; युगे भद्रो व्यवहारेण साधुः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
तृतीय़ं गृह्यतां पुत्र वरमप्रतिमं महत् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
तृतीय़ं च चतुर्थं च पञ्चमं चानिलाशनः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
तृतीय़ं चास्य सम्भूतं नेत्रमादित्यसंनिभम् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
तृतीय़ं ज्योतिरित्याहुश्चक्षुरध्यात्ममुच्यते |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
तृतीय़ं तु समानेन पुनरेव व्यवस्यते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
तृतीय़ं पादमग्निस्ते सुधृतं धारय़िष्यति ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
तृतीय़ं पुरुषं प्राप्य व्राह्मणत्वं गमिष्यति ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
महेश्वर उवाच
तृतीय़ं लोचनं दीप्तं सृष्टं ते रक्षता प्रजाः ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
तृतीय़ं वरय़ास्मत्तो नासि द्वाभ्यां सुसत्कृता |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तृतीय़ं वै रथाकारं चतुर्थं पालनं स्मृतम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तृतीय़ं व्रह्मणो जन्म यदासीद्वाचिकं महत् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
तृतीय़ं शक्र पादं मे तस्मात्सुनिहितं कुरु ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तृतीय़ं सवनं तत्ते वैश्वदेवं युधिष्ठिर |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
तृतीय़ः शन्तनुस्तात धृतिमान्मे पितामहः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
तृतीय़ः सर्ग इत्येष आहङ्कारिक उच्यते ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तृतीय़मपि मासं स पक्षेणाहारमाचरन् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
तृतीय़माय़ुषो भागं वानप्रस्थाश्रमे वसेत् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
तृतीय़मेतद्वालस्य ललाटस्थं च लोचनम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
तृतीय़स्तु महाराज महावाहुर्महासुरः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तृतीय़ा च भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
तृतीय़ां क्रौञ्चपादीं च व्रह्महत्या विशुध्यति ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
तृतीय़े दिवसे यस्तु प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
तृतीय़े पुरुषे तुभ्यं व्राह्मणत्वमुपैष्यति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
तृतीय़ेन तु वाणेन पृथुधारेण भास्वता |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तृतीय़ेय़ं समाख्याता निष्ठा तेन महात्मना ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
तृतीय़ो नास्ति संय़ोगो वधवन्धादृते क्षमः ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तृप्तः शान्तनवश्चापि राजन्वीभत्सुमव्रवीत् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
तृप्तः स्वस्थेन्द्रिय़ो नित्यं यथालव्धेन वर्तय़न् |
४४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तृप्तानि व्यनदन्नुच्चैर्मुदा भरतसत्तम ||
८७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
तृप्यन्ति तृप्यतो देवास्तृप्तास्तृप्तस्य जाजले ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
तृषार्तश्च क्षुधार्तश्च एकाय़नगतः पथि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
तृषितः कलुषं पाता नास्ति ह्रीरशनार्थिनः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तृषितः परिचक्राम मरौ सस्मार चाच्युतम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
तृषितमनिय़तं मनो निय़न्तुं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
तृषितस्तृषिताय़ त्वं दत्त्वैतदशनं मम |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४४
व्राह्मण उवाच
तृषितस्य च पानीय़ं क्षुधार्तस्य च भोजनम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
तृषितस्य च पानीय़ं क्षुधितस्य च भोजनम् ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
तृषिता ह्यभिवीक्षन्त्यो नरं हन्युः सवान्धवम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
तृषिताय़ च यद्दत्तं हृदय़ेनानसूय़ता ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तृषितेन स कौरव्य भिक्षितश्चित्रभानुना |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी नृणाम् |
३४ क