शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
तृष्णाक्षय़सुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
तृष्णाक्षय़सुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
तृष्णाक्षय़सुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
तृष्णातन्तुरनाद्यन्तस्तथा देहगतः सदा ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तृष्णापरिगताः केचिदल्पसत्त्वा विशां पते |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
तृष्णाभिभूतस्तैर्वद्धस्तानेवाभिपरिप्लवन् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
तृष्णामोहौ तु सन्त्यज्य चरामि पृथिवीमिमाम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
तृष्णार्त इव निम्नानि धावमानो न वुध्यते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
तृष्णावद्धं जगत्सर्वं चक्रवत्परिवर्तते ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
तृष्णाविनय़नं भुञ्जे गान्धारी वेद तन्मम ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
तृष्णाशोकश्रमाणां हि त्वं काम प्रभवः सदा ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
तृष्णासञ्जननं स्नेह एष तेषां पुनर्भवः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
तृष्णय़ा हि महत्पापमज्ञानादस्मि कारितः ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
ते अस्त्रे तेजसा लोकांस्तापय़न्ती व्यवस्थिते |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ते आनय़स्व |
१०० घ
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
ते कङ्कगोमाय़ुवलाशनार्थं; क्षीणा विवृद्धिं वहुधा व्रजन्ति ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ते कम्प्यमाना द्रोणेन वाणैः पाण्डवसृञ्जय़ाः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
ते करान्सम्प्रय़च्छन्तु सुवर्णं च कृताकृतम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ते कर्णं भक्षय़िष्यन्तः सर्वतः समुपाद्रवन् |
१०२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
ते कर्णं योधय़ामासुः पाञ्चाला द्रोणमेव च ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
ते कस्याञ्चिदवस्थाय़ां शरणं शरणार्थिने |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ते कार्तय़ुगधर्माणो भागाः परमसत्कृताः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
ते किरन्तः शरव्रातान्सर्वे यत्ताः प्रहारिणः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
ते किरन्तः शरांस्तीक्ष्णान्वारणेन्द्रनिवारणान् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ते किरीटिनमाय़ान्तं दृष्ट्वा हर्षेण मारिष |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ते कीर्यमाणा भीमेन पुत्रास्तव महारणे |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ते कुमाराभिषेकार्थं समाजग्मुस्ततस्ततः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
ते कृच्छ्रं प्राप्य सीदन्ति वुद्धिर्येषां प्रणश्यति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
ते कृता विमुखाः सर्वे मत्प्रय़ुक्तैः शिलाशितैः ||
६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ते कृत्वा चाश्रमं तत्र न्यवसन्त तपस्विनः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ते कृत्वा समरे व्यूहं सूचीमुखमरिन्दमाः |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ते कृत्वावश्यकार्याणि समाश्वस्य च भारत |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ते कोशमग्रतः कृत्वा विविशुः स्वपुरं तदा |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
ते क्रोशमात्रं निपतन्त्यमोघाः; कस्तेन योधोऽस्ति समः पृथिव्याम् ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ते क्षत्रिय़ा दह्यमानास्त्रिभिस्तैः पावकोपमैः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
ते क्षत्रिय़ा रङ्गगताः समेता; जिगीषमाणा द्रुपदात्मजां ताम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
ते क्षत्रिय़ाः कुण्डलिनो युवानः; परस्परं साय़कविक्षताङ्गाः |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
ते क्षत्रिय़ाः क्षतैर्गात्रैर्हतभूय़िष्ठवाहनाः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ते क्षिप्ता भीमसेनेन शरा भारत भारतान् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
ते खल्वपि कृतास्त्राश्च वलवन्तश्च भूमिपाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
ते खल्वपि रमन्ते च मोदन्ते च हसन्ति च ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
ते गच्छन्तस्त्वहोरात्रं तीर्थं सोमश्रवाय़णम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ते गजस्थेन काल्यन्ते भगदत्तेन पाण्डवाः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ते गजा गिरिसङ्काशाः क्षरन्तः सर्वतो मदम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ते गजा घनसङ्काशाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ते गजा विशिखैस्तीक्ष्णैर्युधि गाण्डीवचोदितैः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
ते गत्वा केवलां रात्रिमथ सूर्योदय़ं प्रति |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ते गत्वा दूरमध्वानं न्यग्रोधं प्रेक्ष्य मारिष |
६३ क