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द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
ते गत्वा सहिता देवा व्रह्मणा सह मन्दरम् |
५७ क
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
ते गत्वा सहिताः सर्वे ददृशुस्तत्र कानने |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
ते गत्वाथाव्रुवन्सर्वे राजा नो भव पार्थिव ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
ते गदे सहसा मुक्ते समासाद्य परस्परम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
ते गन्धमादनवनं तन्नन्दनवनोपमम् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान्पापविवर्जितान् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ते गाण्डीवप्रणुदिता नानारूपाः पतत्रिणः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
ते ग्रसन्त इवाकाशं वेगवन्तो महावलाः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
ते घोरा रौद्रकर्माणो विपाठाः पृथवः शिताः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
ते घोषिणः पाण्डवमभ्युपेय़ुः; पर्जन्यमुक्ता इव वारिधाराः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
ते च क्षय़ान्ते जगतो हित्वा लोकत्रय़ं सदा |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
ते च तं पीडय़ामासुरिन्द्रिय़ाणीव वालिशम् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
ते च तद्वलमासाद्य वभञ्जुः सर्वतोदिशम् ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
ते च त्रय़ोदशे वर्षे पारय़िष्यन्ति चेद्व्रतम् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
ते च दृष्ट्वा नरपतिः परां मुदमवाप ह ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
ते च द्वादश कौन्तेय़ राज्ञां वै विविधात्मकाः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति कौरवाः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
ते च पञ्च शतं चैव कुरुवंशविवर्धनाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
ते च पूर्वे सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
ते च पृष्टा यथा व्रूय़ुस्तत्कर्तव्यं तथा भवेत् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
ते च प्राप्यैव सङ्ग्रामे निर्जिताः सव्यसाचिना |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
ते च भेदं गमिष्यन्ति दैवय़ुक्तेन हेतुना ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
ते च राजर्षय़ः सर्वे धिग्धिगित्येवमव्रुवन् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ९२
युधिष्ठिर उवाच
ते च लोमश लोकेऽस्मिन्नृध्यन्ते केन केतुना ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ते च वद्धतनुत्राणा घृताक्ताः कुशचीरिणः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
ते च वश्या भविष्यन्ति प्रसन्ने वृषभध्वजे ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
ते च शोणा वृहन्तोऽश्वाः सैन्धवा हेममालिनः |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ते च सर्वे द्विजश्रेष्ठा विष्टरेषु समन्ततः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
ते च सर्वे महात्मानो धर्मं सत्कृत्य तत्र वै |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
ते च सर्वे महेष्वासाः पाञ्चालाः पाण्डवास्तथा |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
ते च सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
ते च सर्वेऽनुसम्प्राप्ता मम नाराचगोचरम् |
४० क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
ते चतुष्पथनिक्षिप्ते जरा नामाथ राक्षसी |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
ते चान्ये चोदिता नागा राक्षसैस्तैर्महावलैः |
५४ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणैः सम्भृतौषधैः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
ते चापि कौरवीं सेनां निमेषार्धात्कुरूद्वह |
४ क
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
ते चापि तस्मिन्भरतप्रवर्हे; तदा वभूवुः पितरीव पुत्राः ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसाः परिचर्यया ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
ते चापि निपतन्तोऽन्यान्निघ्नन्ति च वनस्पतीन् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
ते चापि निपुणा वैद्याः कुशलाः सम्भृतौषधाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
ते चापि रथिनः सर्वे त्वरिताः कृतहस्तवत् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
ते चापि रथिनां श्रेष्ठा भीमाय़ निशिताञ्शरान् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
ते चापि राक्षसाः सर्वे सैनिका भीमरूपिणः |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
ते चापि राजवचनात्पुरुषा ये गताभवन् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
ते चापि वृहती श्यामे नीलकुञ्चितमूर्धजे |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
ते चापि सदृशं वर्णं जनय़न्ति स्वय़ोनिषु |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
ते चापि सर्वान्प्रतिपूज्य पार्थां; स्तैः सत्कृताः पाण्डुसुतैस्तथैव |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
ते चापि सर्वे प्रवरा नरेन्द्रा; महावला वर्मिणश्चर्मिणश्च |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रिय़ाः पुत्रपौत्रिणः |
५७ ख