आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
त्रैलोक्यं तपसा सिद्धाः पश्यन्तीह समाहिताः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
त्रैलोक्यं नाशय़ाम्येकः कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ||
३२ ग
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
त्रैलोक्यं पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रैलोक्यं संनिगृह्यास्मांस्त्वां च शक्र महावलः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
त्रैलोक्यं सर्वभूतेषु चक्रवत्परिवर्तते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
त्रैलोक्यं सेश्वरं सर्वमहङ्कारे प्रतिष्ठितम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
द्रुपद उवाच
त्रैलोक्यकर्ता कस्माद्धि तन्मृषा कर्तुमर्हति ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
त्रैलोक्यनाथो विष्णुः स यस्यासीत्साह्यकृत्सखा ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६९
धृतराष्ट्र उवाच
त्रैलोक्यनिर्माणकरं जनित्रं; देवासुराणामथ नागरक्षसाम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
त्रैलोक्यप्रकृतिर्देही तपसा तं महेश्वरम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैलोक्यप्राणय़ात्रार्थे वर्षावर्षे भय़ाभय़े |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
त्रैलोक्यभावनास्तात प्राच्यां सप्तर्षय़स्तथा ||
२६ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
त्रैलोक्यमपि कृष्णो हि कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद्योद्धा यस्य धनञ्जय़ः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद्योद्धा यस्य धनञ्जय़ः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
त्रैलोक्यमपि मे कृत्स्नमशक्तं देहधारणे |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैलोक्यमभवद्राजन्रविश्चासीद्रजोरुणः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यमभिसन्तप्तं ज्वराविष्टमिवातुरम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
त्रैलोक्यमसृजद्व्रह्मा कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
त्रैलोक्यराज राज्यं हि त्वय़ि वासव शाश्वतम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
त्रैलोक्यराज्यं धर्मज्ञ कारणं तद्व्रवीहि मे ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्रैलोक्यराज्यनाशे हि कोऽन्यो जीवितुमुत्सहेत् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
त्रैलोक्यराज्याद्यत्किञ्चिद्भवेदन्यत्सुदुर्लभम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
त्रैलोक्यराज्ये सक्तस्य ततो नोपदिशामि ते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
वसिष्ठ उवाच
त्रैलोक्यवलसंय़ुक्तः कस्माच्छक्र विषीदसि ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यविजय़ं श्रीमान्प्राप्तवान्रणमूर्धनि ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
पितामह उवाच
त्रैलोक्यविजय़ार्थाय़ भवद्भ्यामास्थितं तपः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
त्रैलोक्यविजय़ार्थाय़ समास्थाय़ैकनिश्चय़म् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यविजय़े यत्ताविन्द्रवैरोचनाविव ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यविजय़े यादृग्दैत्यानां सह वज्रिणा ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यविजय़े यादृग्दैत्यानां सह वज्रिणा ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यविजय़े युक्ता यथा दैतेय़दानवाः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
त्रैलोक्यसारं तमिषुं मुमोच त्रिपुरं प्रति |
१२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यस्य समस्तस्य शक्तः क्रुद्धो निवारणे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैलोक्यस्यापि राज्येन नास्मान्कश्चित्प्रहर्षय़ेत् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
त्रैलोक्यस्येश्वरो योऽहं परभृत्यत्वमागतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
त्रैलोक्यस्यैव हेतुर्हि मर्यादा शाश्वती ध्रुवा |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
त्रैलोक्यहेतोरसुरैर्यथासी; द्देवस्य विष्णोर्जय़तां वरस्य ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैलोक्यहेतोर्न जहेत्स्वधर्मं; तस्मान्न सर्वे निहता रणेऽस्मिन् |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
त्रैलोक्ये क्षत्रधर्माद्धि श्रेय़ांसं साधुचारिणाम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
त्रैलोक्ये च प्राप्य राज्यं तपस्विनः; कृत्वा वाहान्याति लोकान्दुरात्मा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
श्रीरु उवाच
त्रैलोक्ये ते यदैश्वर्यं तत्तेनापहृतं प्रभो ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
सौदास उवाच
त्रैलोक्ये भगवन्किं स्वित्पवित्रं कथ्यतेऽनघ |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रैलोक्ये यस्य शास्त्रेषु न पुमान्विद्यते समः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
त्रैलोक्ये सागरे चैव प्रमाणं विहितं यथा |
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
त्रैलोक्येऽपहृते तेन विमुखे च शचीपतौ |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्रं प्राप्तो विक्रमणेन च ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
त्रैवार्षिकाद्यदा भक्तादधिकं स्याद्द्विजस्य तु |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
त्रैविद्यवृद्धाः शुचय़ो वृत्तवन्तो मनस्विनः |
७४ क