आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
ते त्विषून्दशसाहस्रांस्तस्मै युगपदाक्षिपन् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
ते त्वय़ा धर्महन्तारो निहताः सपदानुगाः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
ते तय़ा तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
ते दंशिता रथैः सर्वे ध्वजिनः सशरासनाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
ते दंशिताः सुसंरव्धा रथैर्मेघौघनिस्वनैः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
ते दर्शनमनिच्छन्तो देवाः शक्रपुरोगमाः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
ते दर्शय़ेय़ुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मार्कण्डेय़ उवाच
ते दशग्रीवसैन्यं तदृक्षवानरय़ूथपाः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
ते दह्यमाना गन्धर्वाः कुन्तीपुत्रस्य साय़कैः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
ते दह्यमाना द्रोणेन सूर्येणेव विराजता |
१०७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
ते दह्यमानाः पार्थेन पावकेनेव कुञ्जराः |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
ते दानवा इवेन्द्रेण वध्यमाना महात्मना |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
ते दिशः खं च सैन्यं च समावृण्वन्महाहवे |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
ते दिशो विदिशः सर्वाः प्रतिरुध्य प्रहारिणः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
ते दीनमनसः सर्वे देवाश्च ऋषय़श्च ह |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ते दीप्तजिह्वाननतीक्ष्णदंष्ट्रा; विभीषणाः शैलनिकाशकाय़ाः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
ते दुर्गवासं वहुधा निरुष्य; व्यतीत्य कैलासमचिन्त्यरूपम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
ते दुर्धर्षा दुष्प्रकम्प्या विद्यात्तान्व्रह्मणस्तनुम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
ते दृश्यमाना हरिभिर्वलिभिर्दूरपातिभिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
ते दृष्ट्वा तत्र तिष्ठन्तीं सर्वे कृष्णां यशस्विनीम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
ते दृष्ट्वा धर्मराजानं देवर्षिं चापि लोमशम् |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
ते दृष्ट्वा निहतान्सूतान्राज्ञे गत्वा न्यवेदय़न् |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ते दृष्ट्वा वर्ष्मवन्तं तमतिमानुषविक्रमम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ते दृष्ट्वा सहसा पार्थं गोप्तारः सैन्धवस्य तु |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
ते देवसहिताः पार्था न शक्याः प्रतिवीक्षितुम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
ते देवाः सहिताः सर्वे पितामहमरिन्दम |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
ते देशास्ते जनपदास्तेऽऽश्रमास्ते च पर्वताः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
ते द्राव्यमाणाः समरे हार्दिक्येन महारथाः |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं न्यवेदय़न् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
ते द्रोणपुत्रेण हताः किं नु जीवामि केशव ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
ते द्रोणमभिवर्तन्ते सर्वतः कुरुपुङ्गवाः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ते द्रोणमुपशोचन्तः कश्मलाभिहतौजसः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ते द्वन्द्वशः पृथक्चैव सिंहग्रीवा महौजसः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
ते द्वादशं वर्षमथोपय़ान्तं; वने विहर्तुं कुरवः प्रतीताः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
ते धर्ममर्थं कामं च प्रमथ्नन्ति नरं च तम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्वं त्रय़ोदशात् |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
ते धूमरक्तनय़ना वह्नितेजोभितापिताः |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
ते धूमसङ्घाः सम्भूता मेघसङ्घाः सविद्युतः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
ते ध्वजं पाण्डुपुत्रस्य समासाद्य पतत्रिणः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
ते ध्वजाः संवृतास्तेषां पताकाभिः समन्ततः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ते ध्वजैर्वैजय़न्तीभिर्ज्वलद्भिः परमाय़ुधैः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
ते ध्वस्ता धार्तराष्ट्रा हि सर्वे भीमेन धीमता ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ते न क्षता न च श्रान्ता दृढावरणकार्मुकाः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
ते न तस्य वशं जग्मुः केवलं दैवमेव वा ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
ते न निन्द्याः प्रशस्याश्च यत्ते चक्रुर्व्रवीहि तत् ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
ते न शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे स्म सुरास्तदा |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुराः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
ते नदूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालय़ाः |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
ते नराः सुखमेधन्ते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ||
२४ ख