वन पर्व
अध्याय
१०३
लोमश उवाच
ते पूर्वं तपसा दग्धा मुनिभिर्भावितात्मभिः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ते पूर्वं पाण्डुपुत्रेण पृष्टा ह्यासन्सुतं तव |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
ते पूर्वमभिवर्तेरंस्तानन्वगितरे जनाः ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
ते पृच्छ्यमानाः सहिता वचोऽर्थ्यं मन्त्रिणस्तदा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
ते पृथग्दर्शनास्तस्य संविदन्ति तथैकताम् |
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
ते पृष्टा यदुसिंहेन कुरुक्षेत्रफलं विभो |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
ते पृष्टाश्च वदेय़ुर्यच्छ्रेय़ो नः समनन्तरम् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ते पेतुरुर्व्यां वहुधा विरूपा; वातप्रभग्नानि यथा वनानि ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
ते प्रगृह्य महाघोरान्पर्वतान्परिघान्द्रुमान् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
ते प्रगृह्य महाशङ्खान्दध्मुः पुरुषसत्तमाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
ते प्रतिज्ञाप्रतीघातमिच्छन्तः सव्यसाचिनः |
८२ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ते प्रत्यूचुः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
ते प्रत्यूचुरिदं वाक्यं दुःखिताः प्रणताः स्थिताः ||
१०७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
ते प्रदीप्तशिरोदेहाः प्रदीप्ताय़ुधवाहनाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रविश्य पुरं वीरास्तूर्णं जग्मुरथो गृहान् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रविश्य महेष्वासाः सभां समितिशोभनाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१०१
विष्णुरु उवाच
ते प्रविश्योदधिं घोरं नक्रग्राहसमाकुलम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रवृत्तिं प्रय़च्छन्ति ममेमां व्युषितां निशाम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
ते प्रसुप्ते वले तत्र परिश्रान्तजने नृप |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
ते प्रहृष्यन्त समरे दृष्ट्वा पुत्रं तवाभिभो ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
ते प्रापतन्नसिना गां विशस्ता; यथाश्वमेधे पशवः शमित्रा ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
ते प्राप्य धनमक्षय़्यं त्वदीय़ं भरतर्षभ |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रिय़ार्थं कुरुपतेराय़युर्नृपसत्तमाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रीतमनसः शूराः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रीता व्राह्मणा राजन्स्वस्त्यूचुर्जय़मेव च |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
ते प्रीताः प्रीणय़न्त्येतानाय़ुषा यशसा धनैः ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ते प्रेषिता महाराज मद्रराजेन वाजिनः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
ते प्रेषिता महाराज शल्येनाहवशोभिना |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ते प्रेषिताः सुमित्रेण द्रोणानीकाय़ वाजिनः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रय़ाता नरव्याघ्रा मात्रा सह परन्तपाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
ते प्रय़ाता यथोद्दिष्टं दूतास्त्वरितवाहनाः ||
६ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
ते प्रय़ाता व्यरोचन्त परानभिमुखास्त्रय़ः |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
ते भग्नमनसः सर्वे त्रैगर्तकमहारथाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ते भग्ना विकृताङ्गाश्च छिन्नपृष्ठाश्च साय़कैः |
१०५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ते भग्नाः प्रपतन्तश्च निघ्नन्तश्च परस्परम् |
९३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
ते भवन्ति शिवा विप्र ये वै गङ्गां समाश्रिताः ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
ते भवन्तो यथाधर्मं यथासमय़मेव च |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ते भानवोऽप्यनुसृताश्चरन्ति; देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
ते भार्ये कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता च ह |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
ते भार्ये वरसंहृष्टे कश्यपो वनमाविशत् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
ते भावमेकमाय़ान्ति सरितः सागरं यथा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
ते भावय़न्तः पृथिवीं विचरन्ति दिवं तथा ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
ते भिद्यमानास्तत्रैव मनः कुर्वन्तु पाण्डवाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदय़न् ||
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
ते भीता मृद्यमानाश्च प्रमृष्टा दीर्घवाहुना |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
ते भीताः समकम्पन्त तस्य पक्षानिलाहताः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
ते भीतास्त्वभ्यधावन्त सर्वे द्रोणरथं प्रति ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ते भीमभय़सन्त्रस्तास्तावका भरतर्षभ |
३२ क