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आदि पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं पाण्डवं ज्येष्ठं तरुणं वृद्धशीलिनम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
ते वय़ं पाण्डवधनैः सर्वान्सम्पूज्य पार्थिवान् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
ते वय़ं पाण्डुपुत्रेभ्यो हीनाः स्ववलशक्तितः |
४३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं पृथिवीहेतोरवध्यान्पृथिवीसमान् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं प्रणिपातेन गिरीशस्य महात्मनः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
अर्जुन उवाच
ते वय़ं प्रमुखे तस्य स्थापय़ित्वा शिखण्डिनम् |
९८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
ते वय़ं प्रवरं नॄणां सर्वैर्गुणगणैर्युतम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं प्राप्तकालस्य चिकीर्षां मन्त्रय़ामहे |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १३४
युधिष्ठिर उवाच
ते वय़ं मृगय़ाशीलाश्चराम वसुधामिमाम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं राजवंशेन हीनाः सह सुतैरपि |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं वाहुवलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं वीरशय़नं प्राप्स्यामो यदि संय़ुगे |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं वोधितास्तेन वुद्धवन्तोऽशिवं गृहम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
ते वय़ं संशय़ं प्राप्ताः ससैन्याः शत्रुकर्शन |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
ते वय़ं सहितास्तात सर्वाञ्शत्रून्समागतान् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं साधु पाञ्चालान्गच्छाम यदि मन्यसे |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
ते वय़ं सुहृदो हत्वा कृत्वा पापमनन्तकम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ते वय़ं स्मरमाणास्तान्विनिकारान्पृथग्विधान् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
ते वय़ं स्वर्गमिच्छन्तः सङ्ग्रामे त्यक्तजीविताः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
ऋषय़ ऊचुः
ते शङ्कमानास्त्वन्योन्यं पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः |
५४ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ते शङ्खनादेन कुरुप्रवीराः; संमोहिताः पार्थसमीरितेन |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
ते शच्यर्थे महेन्द्रेण याचितः स परन्तपः |
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ते शनैः पुनरेवाशु वाय़ून्मुञ्चन्ति नित्यशः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
ते शनैः प्राद्रवन्सर्वे कृष्णय़ा सह पाण्डवाः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
ते शरा नतपर्वाणो विविशू राक्षसं तदा |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ते शरा मद्रराजेन प्रेषिता रणमूर्धनि |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
ते शरा रुधिराभ्यक्ता भित्त्वा शारद्वतीसुतम् |
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
ते शरा हेमपुङ्खाग्रा व्यदृश्यन्त महीतले |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
ते शरा हेमविकृता गाण्डीवप्रेषिता भृशम् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ते शरा हेमविकृताः सम्पतन्तो मुहुर्मुहुः |
७० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
ते शराः प्राप्य कौन्तेय़ं समस्ता विविशुः प्रभो |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
ते शराः प्रेषिता राजन्भीमसेनेन संय़ुगे |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
ते शराः सात्वतं भित्त्वा प्राविशन्त धरातलम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
ते शराचितसर्वाङ्गा विनदन्तो महारवान् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
ते शरातुरभूय़िष्ठा हताश्वनरवाहनाः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ते शरार्ता महाराज विप्रकीर्णरथध्वजाः |
११४ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
ते शरैः क्षतसर्वाङ्गा भीमसेनभय़ार्दिताः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
ते शरैरग्निसङ्काशैस्तोमरैश्च महाधनैः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ते शरैर्भिन्नमर्माणो रथेभ्यः प्रापतन्क्षितौ |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
ते शश्वद्गोधनाकीर्णमम्वुमन्तं शुभद्रुमम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
ते शार्ङ्गा ज्वलनं दृष्ट्वा ज्वलितं स्वेन तेजसा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २१
कर्ण उवाच
ते शीघ्रमनुगच्छामो यत्र द्रोणो व्यवस्थितः |
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
ते शूराः किङ्किणीजालैः समाच्छन्ना वभासिरे |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
ते शूराः पर्यधावन्त कुर्वन्तो महदाकुलम् ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
ते शूराः समरे राजन्समासाद्य परस्परम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९७
वैशम्पाय़न उवाच
ते शूराश्चित्रवर्माणस्तप्तकुण्डलधारिणः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
ते शूरास्ततधन्वानस्तूणवन्तः समार्गणाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
ते श्रद्दधाना वध्यन्ते मधु शुष्कतृणैर्यथा ||
६७ ख