सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
तेन दैवं परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् |
३४ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
तेन दोषेण पतितस्तस्मादेष नृपात्मजः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तेन द्रोणेन ते तात कथमासीत्समागमः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय
२२८
शकुनिरु उवाच
तेन द्वादश वर्षाणि वस्तव्यानीति भारत ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तेन द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महात्मना |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तेन द्वारेण शत्रुभ्यः क्षीय़ते सवलो रिपुः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
तेन धर्मविदा पार्था याज्याः सर्वविदा कृताः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेन धर्मेण कृतवान्दैवं पित्र्यं च भारत ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
तेन धर्मेण महता सुखलव्धेन भावितः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तेन धर्मोत्तरश्चाय़ं कृतो लोको महात्मना |
१२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
तेन धूमेन सहसा वर्धमानेन भारत |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तेन न च्यावितश्चाहं क्षत्रधर्मात्स्वनुष्ठितात् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
सारिसृक्व उवाच
तेन नः परिरक्षाद्य ईडितः शरणैषिणः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तेन नागेन सहसा धनञ्जय़मुपाद्रवत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
तेन नादेन महता समकम्पत मेदिनी ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तेन नादेन वित्रस्ता पाण्डवानामनीकिनी |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
तेन नारद सम्प्राप्तो न मां शोकः प्रवाधते ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
तेन नाराय़णोऽस्म्युक्तो मम तद्ध्ययनं सदा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तेन नार्घ्यं मय़ा दत्तं पाद्यं चापि सुरेश्वर ||
१६६ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तेन नास्ति समः सूतो योऽस्य सारथ्यमाचरेत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेन निद्रोपरोधेन साध्वसेन च पाण्डवाः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
तेन नूनं भवेदेतत्कर्म लोकहितं कृतम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तेन पद्मसहस्राणि गवां दश महात्मना |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तेन पश्यसि मां पुत्र प्रीतिश्चापि मम त्वय़ि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तेन पश्यामि ते दिव्यान्भावान्हि त्रिषु वर्त्मसु |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
तेन पश्यामि ते दिव्यान्भावान्हि त्रिषु वर्त्मसु ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
तेन पाञ्चालराजश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
तेन पाण्डवसैन्यानां मृदिता युधि वारणाः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
तेन पार्थिवमुख्येन भावितं भावितात्मना ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तेन पार्थो रणे शूरस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
तेन पित्र्याणि कुर्वीत स्पृष्ट्वापो न्याय़तस्तथा ||
९७ ख
आदि पर्व
अध्याय
४
सूत उवाच
तेन पृष्टः कथाः पुण्या वक्ष्यामि विविधाश्रय़ाः |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
तेन प्रकाशेन दिवङ्गमेन; सम्वोधिता देवगणाश्च राजन् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
तेन प्रकाशेन भृशं प्रकाशं; वभूव तेषां तव चैव सैन्यम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
तेन प्रजापतिर्देवान्यज्ञेनाय़जत प्रभुः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
तेन प्रदीप्तेन तथा प्रदीप्तं; वलं तदासीद्वलवद्वलेन |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेन प्रीतिः परस्परेण नौ संवृद्धा |
९२ घ
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
सञ्जय़ उवाच
तेन भग्नानरीन्सर्वान्मद्भग्नान्मन्यते जनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
तेन भिन्नास्तदा वेदा मनोः स्वाय़म्भुवेऽन्तरे |
४० क
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तेन भीष्मेण ते तात कथमासीत्समागमः ||
१४ ग
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
तेन मन्त्रेण राजर्षे यथा स्यान्नौ प्रजा विभो ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
तेन मन्याम्यहं वीर्यमात्मनोऽसदृशं परैः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
तेन मन्युपरीतेन शप्तोऽस्मि मनुजाधिप ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तेन मन्ये मघवता सममात्मानमद्य वै ||
५४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
सैरन्ध्र्यु उवाच
तेन मां दुःखितामेवं पृच्छसे प्रहसन्निव ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
तेन मार्गेण विपुलं व्यचरद्गन्धमादनम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तेन माय़ामय़ाः कॢप्ता हय़ास्तावन्त एव हि |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तेन मुक्ता रणे राजञ्शराः शत्रुनिवर्हणाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तेन मुक्ताः शरा घोरा विचेरुः सर्वतोदिशम् |
२४ क