शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
तेन वैद्यस्तपस्वी वा वलवान्वा विमोह्यते ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
तेन वैरं समासज्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेन वो दर्शनीय़ेन वीरेणातिधनुर्भृता |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेन वो भीमसेनेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेन वो भीमसेनेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेन वो वासुदेवेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेन वो विजय़ेनाजौ पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेन वो वृष्णिवीरेण युय़ुधानेन सङ्गरः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
तेन व्यूढेन सैन्येन लोकानुद्वर्तय़न्निव |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
तेन शक्र न शोचामि नापराधादिदं मम ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
तेन शक्र न शोचामि नास्ति शोके सहाय़ता ||
८६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमद्य वै |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
तेन शव्देन घोरेण मृगाणामथ पक्षिणाम् |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
तेन शव्देन चाविष्टश्चुक्रोध वलवद्वली ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
तेन शव्देन चोग्रेण भीमसेनरवेण च |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
तेन शव्देन भीमस्य वित्रेसुर्मृगपक्षिणः |
७३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन महता पूरितासीद्वसुन्धरा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन महता पूरितेय़ं वसुन्धरा |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
तेन शव्देन महता पूर्णश्रुतिरथाव्रवीत् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन महता संहृष्टाश्चक्रुराहवम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
तेन शव्देन महता समुद्रे पर्वतोपमाः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्ता कलिङ्गानां वरूथिनी |
३३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्ता धनुर्हस्ता महारथाः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्ता धार्तराष्ट्राः ससैन्धवाः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्ता पाण्डवानां महाचमूः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्ता संशप्तकवरूथिनी |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्ताः सर्वे सहय़वारणाः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्तान्पाञ्चालान्भरतर्षभ |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
तेन शव्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
तेन शव्देन वित्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ||
२८ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वीरस्तु श्रुतकीर्तिर्महाधनुः |
५७ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
तेन शव्देन सम्भ्रान्तः सहसान्तःपुरे जनः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रय़ोनावजाय़त |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
तेन शास्त्रेण लोकेषु क्रिय़ाः सर्वाः करिष्यति ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
तेन शिष्येण सर्वेभ्यः शस्त्रविद्भ्यः समन्ततः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
तेन शूद्रान्नशेषेण व्रह्मस्थानादपाकृतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
तेन संनादशव्देन लोकाः सङ्क्षोभमागमन् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
तेन संमन्त्र्य वेत्स्यामो वधोपाय़ं दुरात्मनः ||
४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तेन संलोड्यमानं तु पाण्डूनां तद्वलं महत् |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
तेन संवर्धितः स्नेहस्त्वय़ा मे क्षत्रिय़र्षभ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
तेन संस्पृष्टमात्रस्य भिमसेनस्य वै तदा |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
तेन संय़ुगमेष्यन्ति मन्दा विलपतो मम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
तेन संय़ोजय़ेथास्त्वं तीर्थपुण्येन पाण्डवम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
तेन सङ्गम्य ते भार्या तनय़ं जनय़िष्यति |
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
तेन सङ्गम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चय़म् ||
४१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
तेन सङ्गम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चय़म् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
तेन सञ्चोद्यमानस्तु ततस्तांस्तुरगोत्तमान् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
तेन सञ्चोद्यमानस्तु याहि याहीति सारथिः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तेन सत्त्ववता सङ्ख्ये शूरेणाहवशोभिना |
४० ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
तेन सत्याभिसन्धेन वासुदेवेन रक्षिताः |
३० क