आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
तेनानन्ता दिवि लोकाः श्रितास्ते; विद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तेनानुचरता तस्मिन्वने विश्वस्तचारिणा |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
तेनानुशिष्टः प्रवणादिवाम्भो; यथा निय़ुक्तोऽस्मि तथा वहामि ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
तेनानुशिष्टः प्रवणादिवोदकं; यथा निय़ुक्तोऽस्मि तथा वहामि ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव; पराभूता दानवाः सर्व एव ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव; लोकद्विष्टाः पन्नगाः सर्व एव ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
तेनानुशिष्टा वान्धवा वन्धुमन्तः; सप्तर्षय़ः सप्त दिवि प्रभान्ति ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
तेनानुशिष्टार्ष्टिषेणेन चैव; तीर्थानि रम्याणि तपोवनानि |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
तेनानुशिष्टो व्रह्मापि स्वं लोकमचिराद्गतः ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तेनान्तरेण वीभत्सुर्विवेशामित्रवाहिनीम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तेनान्तरेणाभिमन्योर्यन्तापासारय़द्रथम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
तेनापि दक्षिणो हस्तो दत्तः प्रत्यर्चनार्थिना ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तेनापि मे नैव मुच्येत युद्धे; न चेत्पतेद्विषमे मेऽद्य चक्रम् ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तेनापि रक्षिताः पार्थाः शिष्यत्वादिह संय़ुगे |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
तेनापि समनुज्ञातो भार्गवेण महात्मना |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तेनापि सुहृदा व्रह्मन्पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
तेनापोहति धर्मात्मा दुष्कृतं कर्म पाण्डव ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तेनाप्येतन्महद्दिव्यं चक्रमप्रतिमं मम |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
तेनाप्येवं न वाच्योऽहं यदि धर्मं प्रपश्यसि ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेनाभिमन्युना सङ्ख्ये पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
तेनाभिषिक्तः कृष्णेन तत्र मे कश्मलोऽभवत् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
तेनाभूद्धततेजाः स निःश्रीकश्च शचीपते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
तेनामर्षेण सन्तप्तः प्राय़मासितुमैच्छत ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
तेनामृतत्वं व्रजति सा काष्ठा पुण्यकर्मणाम् ||
३९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तेनारम्भेण महता मामुपास्ते महामुने ||
१२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
तेनार्थवद्धं मन्यते धार्तराष्ट्रः; शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तेनार्दिता महाराज भारती सा महाचमूः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तेनार्दिता महाराज रथिनः सादिनस्तथा |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तेनार्द्यमाना राजेन्द्र सेना तव विशां पते |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
तेनार्द्यमानाः समरे द्रवमाणाश्च सोमकाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
तेनार्धं वाससश्छित्त्वा निवस्य च परन्तपः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
तेनावकीर्णा रजसा देवा मोहमुपागमन् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
तेनावध्या रणे पार्था जय़युक्ताश्च पार्थिव ||
१६ ग
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
तेनावध्योऽस्मि लोकेषु ततो नैतद्ददाम्यहम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तेनावाक्पतता दावे शैलेन महता भृशम् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
तेनाविष्टं हि यत्किञ्चिच्छिपिविष्टं हि तत्स्मृतम् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
तेनाशुगैर्वध्यमाना रथौघाः; प्रदुद्रुवुस्तत्र ततस्तु सर्वे ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
तेनाश्वांश्चतुरोऽमृद्नाच्छाल्वराज्ञो नराधिप ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तेनासीत्सुमहद्युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तेनासीदति तेजस्वी दीप्तिमान्हव्यवाहनः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
तेनासुरा विजिताः सर्व एव; तस्य विक्रान्तैर्विजितानीह त्रीणि |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तेनासौ कर्मणा भीष्म प्रेत्य चेह च मोदते ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
तेनासौ रथवंशेन महत्कर्म करिष्यति ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तेनासौ सहितो राजा यय़ौ व्यासाश्रमं तदा |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
तेनास्त्रेण हय़ान्पूर्वं हत्वा कर्णस्य राक्षसः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेनास्मि नागलोकं नीतः ||
१६६ ग
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेनास्मि सोपचारमुक्तः |
१७१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
तेनास्य धनुषः कोटिश्छिन्ना भूमिमथागमत् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
तेनास्य मातापितरौ त्रेसतुस्तौ सवान्धवौ |
२ क